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मंडल कमीशन के लिए खुद को दांव पर लगा गए थे लालू यादव

मैं यह कहूँ कि “मण्डल कमीशन” के लिए लालू प्रसाद यादव जी ने खुद को दांव पर लगा दिया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्योकि मैं 1990 के मंडल आंदोलन का गवाह हूँ और इसके लिए डंडे खाने से लेकर जेल जाने, दिल्ली/लखनऊ/गोरखपुर/देवरिया में प्रदर्शन/रैली/आन्दोलन करने में शामिल रहा हूँ। मैं मण्डल आंदोलन के दौर में देवरिया युवा जनता दल का जिलाध्यक्ष था इस नाते मण्डल आंदोलन में जिम्मेदारी कुछ ज्यादे ही थी और उस दौर की घटनाएं आज भी जेहन में बिलकुल तरोताजा हैं।

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लालू प्रसाद यादव जी 1989 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने कर बाद बिहार में दबे-कुचले लोगो को तेजी से उभार रहे थे। वे सदियों से दबाए गए लोगो मे उत्साह का संचार कर रहे थे। बिलकुल निचले पायदान पर खड़ी जातियों में नेतृत्व पैदा करने का कार्य बिहार में लालू जी कर रहे थे।दिल्ली में जनता दल की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार सत्त्तासीन थी। वी पी सिंहः जी प्रधानमंत्री तो देवीलाल जी उप प्रधानमंत्री थे। चन्द्रशेखर सिंह जी प्रधानमंत्री न बन पाने से आहत थे लिहाजा वीपी सिंह जी को पदच्युत करने का लगातार अभियान जारी रखे हुए थे।

धीरूभाई अंबानी जी चन्द्रशेखर जी के मित्र थे, वे चन्द्रशेखर जी को प्रधानमंत्री बनाने हेतु कुछ भी कर गुजरने पर आमादा थे। देवीलाल जी ने वीपी सिंह जी के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया और वीपी सिंह जी की सरकार गिरने की तरफ अग्रसर हो गयी। लालू जी, शरद जी और रामविलास पासवान जी की तिकड़ी एक साथ थी। इन तीनो नेताओ ने वीपी सिंह जी से जनता दल के घोषणा पत्र में उल्लिखित मण्डल कमीशन की याद दिलाई और इसे लागू करने का सुझाव दिया। मैं धन्यवाद दूंगा वीपी सिंह जी को जिन्होंने अलोकप्रियता का ख्याल किये बगैर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद 7 अगस्त 1990 को मण्डल लागू करने का ऐलान कर दिया। मण्डल कमीशन लागू करने की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी असहज स्थिति में आ खड़ी हुई और उसने आडवाणी जी के नेतृत्व में रामरथ का दौरा तेज कर दिया।वीपी सिंह जी की सरकार मण्डल कमीशन लागू करने के बाद पदच्युत हो गयी। आडवाणी जी का रामरथ कमण्डल लेकर मण्डल को निगलने हेतु निकल पड़ा था,पूरा देश मण्डल-कमण्डल में बंट गया था।

चन्द्रशेखर जी प्रधानमंत्री बन गए थे। मण्डल कमीशन की लड़ाई सड़क से लेकर कोर्ट तक चल पड़ी थी। लालू प्रसाद यादव जी मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए उत्तर भारत में मण्डल कमीशन की लड़ाई के नायक के रूप में आगे आ गए थे। शरद जी को मण्डल रथ से उत्तर भारत में मंडल कमीशन के पक्ष में जमीन तैयार करने के लिए मधेपुरा से लालू जी ने झंडा दिखाके रवाना किया था। लालू जी ने जगह-जगह मण्डल कमीशन के पक्ष में रैलियां की। वर्षो तक मण्डल की लड़ाई को अंजाम तक पंहुचाने के लिए लालू जी सड़क,सदन और सर्बोच्च न्यायालय में लड़ते रहे।लालू जी ने बिहार,यूपी सहित देश के अनेक राज्यो में रैलियां की, पटना, लखनऊ, दिल्ली में सम्मेलन व रैलियां हुईं।

जेल भरो आंदोलनों से लेकर प्रदर्शनों का लंबा दौर चला। लालू जी ने इंदिरा साहनी केस में मण्डल कमीशन की लड़ाई जीतने हेतु रामजेठमलानी जी को खुद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वकील रखा।लालू जी सुप्रीम कोर्ट में दायर मुकदमे की पैरवी अपने निजी केस की तरह देखते हुए पैरवी में लगे रहे। लालू जी के सद्प्रयासों,मेहनत,दृढ़ निश्चय से मण्डल कमीशन 7 अगस्त 1990 को लागू किये जाने की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवम्बर 1992 को फैसला कर लागू करने की तरफ बढ़ सका। लालू जी ने रामजेठमलानी जी के आरगूमेंट से और तमाम साक्ष्यों को प्रस्तुत करवाके अपनी ऐंडी-चोटी लगा करके सुप्रीम कोर्ट से मण्डल के पक्ष में फैसला दिलवाने में महती भूमिका निभाई जिसकी बदौलत श्री एमएच कानिया जी के नेतृत्व की बहुसदस्यीय खंडपीठ ने कुछ विसंगतियों के साथ इस ऐतिहासिक मण्डल कमीशन को लागू करने का फैसला सुना दिया।


लालू जी मण्डल कमीशन को छूकर छोड़े नही बल्कि मण्डल कमीशन को उसके लागू होने तक पीछा करते रहे।लालू जी ने मुख्यमंत्री रहकर पद का उपभोग करने,अभिजात्य वर्गो का दुलारा बनने हेतु अपने वर्गीय हित को तिलांजलि देने का अन्य लोगो की तरह अपराध नही किया।लालू जी ने अलोकप्रियता भोगा, गालियां सुनी लेकिन मण्डल कमीशन के मुद्दे पर समझौता नही किया।बिहार के तमाम या यूं कहें प्रायः सभी पिछड़े-दलित नेताओं की तरह स्वहित में अभिजात्य वर्गो व इन अभिजात्य वर्गो की पार्टियों के समक्ष समर्पण करना लालू जी ने स्वीकार नही किया जिसका खामियाजा लालू जी सीबीआई उत्पीड़न,जेल जाने,चाराचोर कहलाने के रूप में भुगते है और भुगत रहे हैं।

सोचने की बात है कि कोई चैनल, मीडिया, सरकारी एजेंसियां, देश के अभिजात्य वर्ग की पार्टियां या हमारे समाज के कथित ईमानदार बुद्धिजीवी जगन्नाथ मिश्र जी को चाराचोर नही कहते जबकि चारा घोटाले का भंडाफोड़ करने वाले लालू जी चाराचोर के रूप में ख्यातिप्राप्त हैं।क्या हम सबने यह सोचा है कि लालू जी को डिस्क्रेडिट करने के लिए उनका मखौल क्यो उड़ाया जाता है? लालू जी ही देश की सीबीआई, मीडिया, राजनैतिक घरानों के टारगेट क्यो हैं? क्या इस देश मे लालू जी से बड़े-बड़े पूंजी खोर अन्य नेता नही हैं? कुछ वर्षों में 300 गुना सम्पत्ति बढ़ाने वाले नेताओं के वहां सीबीआई क्यो छापे नही डालती? मैं स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि लालू जी ने इस देश मे दो बड़े अपराध किये हैं जिसकी सजा उन्हें अभिजात्य वर्ग द्वारा मिलनी ही है।

लालू जी ने पहला अपराध पिछडो की वकालत कर उन्हें मण्डल कमीशन दिलवाने व लागू करवाने का किया है और दूसरा अपराध आडवाणी जी की रथयात्रा रोक करके भाजपा को दशकों पूर्व दिल्ली की सत्ता में आने से रोकने का किया है।लालू जी ने सामाजिक न्याय एवं साम्प्रदायिक सद्भावना के एजेंडे को अपने जीवन का आदर्श बनाके इस देश के अभिजात्य समाज को नाराज करने का जो अपराध किया है उसकी सजा लालू एवं लालू के परिवार को भोगना ही है।

भारतीय धर्मशास्त्र गवाह हैं कि जिन गैर सवर्णो ने इस देश मे वंचितों की बात किया है वे कथित भगवानों मसलन विष्णु, इंद्र, नरसिंह, राम, बामन आदि के द्वारा मारे गए हैं।जिस किसी अनार्य राजा ने मनु के विधान के इतर आवाज उठाई या कार्य व्यवहार किया वे बलि, हिरणकश्यप, रावण, महिषासुर आदि के रूप में विद्रूप कर हत दिए गए और उनकी हत्या पर जश्न मनाया गया जैसे आज लालू जी को चाराचोर कह जश्न मनाया जा रहा है।

मेरे ख्याल से अभी गनीमत है कि दुनिया की निगाहें पड़ने,लोकतंत्र होने और अम्बेडकरी संविधान लागू रहने से लालू जी का वध नही किया गया है वरना यदि सामाजिक न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने का कार्य लालू जी कुछ सौ वर्ष पूर्व किये होते तो वे भी इन कथित असुरों की श्रेणी में सूचीबद्ध कर उन्ही के हश्र को प्राप्त हो गए होते।

मैं निःसंकोच लालू जी को “7 अगस्त मण्डल दिवस” पर कह सकता हूँ कि मण्डल का हीरो “लालू” ही हैं। मैं इस मण्डल नायक को मण्डल दिवस पर सलाम करता हूँ और इनके दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्र भूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका ‘यादव टाइम्म’ के प्रधान संपादक हैं।)

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