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वंचितों के लिए शिव की तरह जहर पिया है लालू ने …

लालू जी आज जो कुछ हैं या जिस मुकाम पर पँहुचे हैं, उसका बहुत ही गूढ़ कारण है। लालू जी मिशन के प्रति समर्पण सहित अपने सरल, सहज, गम्भीर, संघर्षशील, कठिन से कठिन परिस्थितियों से लड़ने वाले, हार न मानने की प्रबृत्ति वाले एवं विशाल हृदय के मालिक वाले स्वभाव के कारण अजेय और अपराजेय हैं। लालू जी नरम दिल, किसी पर जल्द विश्वास करने वाले, दयालु एवं शंकर की तरह अभय दानी प्रबृत्ति के राजनेता है। यदि वे ऐसा न होते तो वे लोग जिन्हें जब राजनीति में वनवास होने को था, लालू जी उबार कर बाहर न निकालते तथा वे लालू जी का आशीर्वाद पा तंदुरुस्त हो उन्हें डंस न पाते। लालू जी ने किसे नही उबारा है बिहार में और उन सबने उबरने के बाद लालू जी को डसें बिना छोड़ा भी नही है फिर भी लालू जी मुस्कुराते हुए किसी दूसरे पीड़ित को उबारने में सन्नद्ध हो गए हैं।

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लालू जी ने बिहार को उबारा है, बिहार के दमित, शोषित लोगो को आवाज दिया है, उन्हें तन कर चलने का साहस दिया है।वह समय याद करिए जब कर्पूरी ठाकुर जी जैसा गरीबो का मसीहा बिहार में मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा में अपमानित हुवा था। पटना के चौराहों पर बिहार के मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर जी को उनकी मुख्यमंत्री की गाड़ी रोककर गालियां दी गयी थी और कर्पूरी जी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि गालियां देना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है और हम लोग गालियां बर्दाश्त करने वाले लोग हैं। एक वह समय था जब बिहार जननायक कर्पूरी ठाकुर जी तक को मुख्यमंत्री रहते गालियां दी गयी और एक वह समय आया जब लालू जी जैसा चमत्कारी नेतृत्व कर्पूरी जी के अरमानों को मूर्त रूप देना शुरू किया तो उन गालियां देने वालो की हलक सूख गई और कर्पूरी जी को गालियां देने वाले लालू जी के नेतृत्व में नारा लगाने लगे कि “कर्पूरी तेरे अरमानो को दिल्ली तक पँहुचाना है।”लालू जी को वे पिछड़े-वंचित समाज के लोग जो उन्हें उनके योगदान को जाने बगैर तथा अपने पुरखों की दुर्गति को याद किये बगैर जब दोषारोपित करते हैं तो बड़ी कोफ्त होती है कि ये नई पीढ़ी के बदमिजाज लोग जिन्हें लालू जी के कारण चौराहे पर दबंगो के सामने बोलने की आवाज मिली है वे उसे ही और उसके योगदान को ही भूल गए? याद करना होगा 1977 का वह दौर जब बिहार के सामंती प्रबृत्ति के लोग पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर जी को उनके मुंह पर गालियां देने की हिम्मत रखते थे और 1989 में लालू जी के सामने जमीन पर बैठने में गर्व महसूस करने लगे और कर्पूरी ठाकुर जी की सन्तानो को गले लगाने लगे।

लालू जी ने वंचितों का मन बड़ा करने के लिए क्या-क्या नही किया? लालू जी मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद को जमाने द्वारा मसखरा कहलाना पसंद किये लेकिन वंचित तबकों को मंच पर सभाओ में सरेआम यह दिखाया कि देखो लालू क्या करना चाहता है बिहार में?बिहार की दबी-कुचली,वंचित जमात के लिए,उन्होंने कुर्ता के ऊपर बनियान पहना जिसे देखकर लोग सभाओ में लोटपोट हुए फिर लालू जी ने इसे एक्सप्लेन करते हुए कहा कि ऐ बिहार के गरीब भाइयों!अब तक कि परम्परा थी कि बनियान नीचे और कुर्ता ऊपर रहता था।बनियान पसीना सोखता है,बनियान शरीर को सुरक्षा देता है लेकिन नीचे रहता है जबकि कुर्ता कुछ न करने के बावजूद ऊपर रहके इतराता रहता है।लालू अब बिहार में पसीना बहाने वाले,नीचे रहने वाले शोषित लोगो को ऊपर उठाने के संकल्प के साथ आपके बीच खड़ा है।लालू जी के इस प्रयोग पर खूब उपहास मचा लेकिन लालू जी ने ऐसा कर गरीबो,वंचितों, मनहीनो,तनहीनो,धनहीनों का आत्मबल मजबूत किया।

लालू जी ने मंच पर दही,चिउड़ा,चीनी और मिर्चा मँगाके खाया और फिर मंच से इसकी ब्याख्या करते हुए कहा कि मिर्चा भूमिहार है इसे काटिये मत,सीधे निगल जाइये,काटेंगे तो तीखा लगेगा।उन्होंने सवर्ण जातियो से भय छुड़ाने के लिए बिहार के पिछड़े,दलित तबको को उत्साहित किया। उन्हें सत्ता,नौकरी,राजनीति,ठेकेदारी में ताल ठोक के प्रतिनिधित्व दिया जिस नाते 1989 के बाद बहुत बड़ी संख्या में गैर सवर्ण जमात सत्ता के करीब नजर आने लगी। लोग बोलने लगे। जुल्म-ज्यादती का प्रतिकार होने लगा।गांवों में बाबू, मालिक,साहब आदि विशेषणों से विभूषित लोग अब वंचित जमातों द्वारा ललकारे जाने लगे।बिहार समता और समानता की तरफ अग्रसर होने लगा।इन शोषित-पीड़ित वर्गो के लोग विधायक, सांसद, मंत्री, पदाधिकारी, मास्टर, प्रोफेसर, कलक्टर, एसपी आदि बनने लगे। मनहीनो का मन बढ़ने लगा,तनहीनो का तन तनने लगा। धनहीनों का धन बढ़ने लगा। सामाजिक न्याय की अवधारणा मूर्त रूप लेने लगी।डॉ लोहिया और डॉ अम्बेडकर के सपनो को पंख लगने लगा। चमरौटी से अहिरौटी तक,पसिऔटी से कुरमौटी तक लकदक सफेद कुर्ता पहने लोग नेताजी कहलाने लगे।अब किसी की हिम्मत नही थी कि वह उन्हें गलिया सके।

लालू जी ने मेहतर बरादरी के भोला राम तूफानी को मंत्री बना हेलीकाप्टर से चंपारण भेज सामाजिक न्याय की उस परिकल्पना को परिपूर्ण किया जिसमें ग्वालियर की महारानी के समक्ष सूक्खो मेहतरानी को सांसद बनाने का सपना डॉ लोहिया के मन मे निहित था।हिन्दू समाज की सबसे दमित बिरादरी को लालू जी ने अपनी कैबिनेट में जगह देकर अमूल्य सामाजिक क्रांति का आगाज किया।अपने बगल में सत्ता के शीर्ष पर समाज के सबसे निम्न व्यक्ति को बैठाके लालू जी ने मनु के विधान को एक झटके में तोड़ डाला।पिछड़ी और दलित जातियों से चुन-चुन करके लालू जी ने सांसद,विधायक और मंत्री बनाके उनके मूक समाज को सामंती जमातों के बीच खुलके बहस करने की सलाहियत दी।अपनी लाठी को खड़ी कर लालू जी ने सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को प्रोटेक्शन दिया।


लालू जी ने बिहार में वहां के कमजोर तबकों को मन से मजबूत बनाने के लिए पटना में लाठी रैली करवाया और कहा कि लाठी में तेल पिलाक़े लाठी को मजबूत बनाओ और कमजोर तबकों को सताने वाले मजबूत लोगो से इसी लाठी के जरिये रक्षा करो।

लालू जी ने बिहार के लोगो को पोंगापंथ से बाहर निकालने के लिए बोल दिया कि पोथी-पतरा फूंक दो।ब्राह्मणवाद के जाल में मत फँसो। अपने बच्चों को पढ़ाओ। मजदूरी और बेगारी के संत्रास से मुक्त होवो, खुद मालिक बनो। लालू जी ने मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दमित तबको के बच्चों को खुद नहलाया, नाखून काटा,बाल काटा, पढ़ने को प्रेरित किया।लालू जी ने बिहार के पशुपालक जातियों को शिक्षा की तरफ अभिमुख करने के लिए बिलकुल अभिनव प्रयोग किया और चरवाहा विद्यालय खोलके उन्हें मवेशी चराने के साथ-साथ पढ़ने को कहा। लालू जी अपने इस प्रयोग से पशुपालक जातियों में पढ़ाई के प्रति रुझान जगाने में कामयाब हो सके।

लालू जी ने सत्ता को वंचित तबको के तरक्की का औजार बनाया।पटना से दिल्ली तक लालू जी ने वंचितो के पक्ष में अपनी ललकार और हुंकार को गुंजित किया।मण्डल कमीशन की लड़ाई को धार दिया। इसे लागू करवाया।मण्डल के विरुद्ध इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट में खुद के द्वारा रामजेठमलानी जी जैसे ख्यातिलब्ध वकील को मुंहमांगी फीस देकर रखा और उसे लागू करवाने हेतु मजबूत दलील खड़ी करवाया। लालू जी ने रामजेठमलानी जी को सम्पूर्ण साक्ष्य उपलब्ध कराके मण्डल की लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट से फतह करवाके अब तक अनगिनत पिछडो को चपरासी से कलक्टर बनने का मार्ग प्रशस्त किया।

लालू ने शिव की तरह खुद अपमान,आक्षेप,लांछन का जहर पिया लेकिन सम्पूर्ण पिछड़े पीड़ित समाज को शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान, अधिकार, आरक्षण, मण्डल रूपी अमृत दिलवाया। लालू जेल गए,चारा चोर कहलाये,सीबीआई से प्रताड़ित हुए,उनका पूरा कुनबा केंद्र की अभिजात्य समर्थक सरकारों द्वारा टारगेट हुआ पर लालू न झुके ,न रुके,न आह भरे,न उफ किये,लालू संघर्षरत रहे। लालू जी का प्रादुर्भाव उत्तर भारत के वंचितों को हिम्मत देने के लिए हुवा और उन्होंने उसका बखूबी निर्वहन भी किया जिसकी बदौलत 1989 के बाद अब तक बीते 30 वर्षो में इन वंचित तबकों के बीच से ऐसी नई जमात खड़ी हो गयी है जो किसी से दबने वाली नही है। हां एक कमी इन नई जगी और तनी हुई जमातों में दिख रही है कि वह अपने इस इतिहास पुरुष लालू के योगदान को भूल रही है। याद रखिये हमारे तन कर खड़े होने में लालू का बहुत बड़ा योगदान है जिसे हमें भूलने या झुठलाने की बजाय एप्रिसिएट करना चाहिए।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका ‘यादव शक्ति’ के प्रधान संपादक हैं। )

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