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यह डेरों की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी-समतावादी राजनीति की असफलता है

यह डेरों की सफलता नहीं, आंबेडकरवादी-समाजवादी- समतावादी राजनीति की असफलता है।

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हरियाणा, पंजाब और साथ लगे राजस्थान का हिस्सा सामाजिक आंदोलनों की दृष्टि से बंजर साबित हुआ है।

यह देश में अनुसूचित जाति की सबसे सघन आबादी वाला इलाक़ा है। हर तीसरा आदमी SC है।

यहाँ समाजवादी आंदोलन कभी नहीं पनप सका। मंडलवादी-समतावादी राजनीति से भी यह इलाक़ा अछूता रहा। बीएसपी का यहाँ का उभार भी क्षणिक साबित हुआ। बाक़ी का आंबेडकरवादी आंदोलन भी सीमित ही रहा।

ऐसे में जनता के पास कोई सपना नहीं बचा। कोई भी नहीं था जो बेहतर समाज का सपना दिखाए।


इसी शून्य में नीचे की जातियाँ डेरों की शरण में चली गई। यहाँ का भाग्यवाद उन्हें सुकून देता है। साथ बैठकर प्रवचन सुनना ही इनका एंपावरमेंट है।

कोई ब्राह्मण तो डेरों में जाता नहीं है। उनका तो अपना मंदिर है। डेरा नीची की जातियों के लोगों के लिए हैं।

हालाँकि कोई भी बाबा नीचे की जातियों का नहीं है। ये बाबा चुनाव के समय जनता को इस या उस पार्टी को बेच देते हैं।

जनता के पास विकल्प क्या था? जिसने विकल्प दिया, लोग उसके पास चले गए।

आंबेडकरवादियों ने ज़मीन ख़ाली कर दी, बाबाओं ने पकड़ ली। जनता के पास आंबेडकरवादी विकल्प था कहाँ?

इसलिए डेरा भक्तों को दोष मत दीजिए।

यह समाजवादी-आंबेडकरवादी राजनीति की असफलता का साइड इफ़ेक्ट है।

समाजवादी-आंबेडकरवादी सपनों के बिना समाज का डेरा बन जाता है।

वहाँ ऐसे लोग राज करते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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