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‘ब्राह्मणवादियों के नहले पर श्रीमति शीला का दहला’

देश और दुनिया में बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहा है। विज्ञान की अज्ञान पर विजय जारी है। चन्द्रमा और मंगल अब हमारी पँहुच में हैं। हम अकल्पनीय शोध और खोज कर रहे हैं लेकिन कुछ पाखंडी हैं कि अभी भी अपनी चोंचलेबाजी जारी रखे हुए हैं।

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हिमाचल व देश के कई हिस्सों में अभी भी हिन्दू धर्म पर मनुवाद की साया बदस्तूर चिपकी हुई है। मन्दिरों व धर्मस्थलों पर अभी भी लिखा हुआ है कि “यहाँ शूद्र प्रवेश वर्जित है।” अभी भी तुलसी दास जी की चौपाई कंठस्थ कराई जा रही है कि “शूद्र, गंवार, ढोल, पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।”

नए संविधान, नई सोच, ऊंची शिक्षा आदि के बावजूद दलित/दमित/अन्त्यज/पिछड़ी जातियों को कुएं और हैण्डपम्प से पानी पीने की मनाही, साथ बैठने की मनाही, मन्दिर जाने से मनाही, साथ खाने से मनाही, धार्मिक क्रिया-कर्म करने की मनाही का मनुवादी फरमान अभी भी जारी है। हमारे जैसे लोग इन मनाहियों पर कह सकते हैं कि यह सब करने की जरूरत ही क्या है पर सभी लोग तो ऐसा नहीं कह सकते हैं और न कर सकते हैं। क्योंकि उनके अंदर हजारों वर्ष के देवी-देवता का कॉन्सेप्ट रचा-बसा है इसलिए वे यह सब करेंगे लेकिन जाति के नाते उन्हें व्यवधान और अपमान भी भोगना पड़ेगा।

न्यूटन का नियम है कि “हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। “समाज में जब जागृति आएगी तो प्रतिक्रिया होगी। विभिन्न स्थानों पर लिखकर या व्यवहारिक तौर पर 85 प्रतिशत वंचित आबादी को जैसे अपमानित किया जाता है कि “मंदिर में शूद्र प्रवेश वर्जित है।” उसी के जबाब में गाजियाबाद में एक महिला श्रीमती शीला जी ने अपने दरवाजे पर लिख दिया है कि “ब्राह्मणवादियों एवं पूंजीपतियों का प्रवेश वर्जित है।”

इस बहादुर महिला ने जो लिखा है वह काबिलेतारीफ है।हम इस तरह की प्रबृत्ति के हिमायती न होते हुए भी इस बहादुर महिला के जज्बे को सलाम करते हैं और यही कहते हैं कि इसे ही “नहले पर दहला” या “ईंट का जबाब पत्थर से देना” कहा जायेगा।


https://www.youtube.com/watch?v=Ui5Ce6-F5ds

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