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जन्मदिवस विशेष: ब्राह्मणवाद के विध्वंसक और सामाजिक क्रांति के योद्धा रामवरूप वर्मा को नमन

उत्तर भारत मे सशक्त रूप में सामाजिक न्याय एवं सामाजिक परिवर्तन के लिए अर्जक संघ की स्थापना कर उत्तर प्रदेश की विधानसभा से लेकर सड़क तक ढोंग/पाखण्ड/कुरीतियों/भाग्य/भगवान/पूजा-अर्चना/लग्न-मुहूर्त/मृत्यु भोज आदि का बहिष्कार कर एक वैज्ञानिक/पदार्थवादी/तार्किक विचारधारा को मजबूती से प्रतिपादित करने वाले स्मृतिशेष रामस्वरूप वर्मा जी पेरियार साहब एवं बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी के बाद मनुवाद में पूरी शिद्दत से जकड़े हिंदी बेल्ट में क्रांति का अलख जगाने वाले चंद नामो में एक हैं।

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रामस्वरूप वर्मा जी मूलतः सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े राजनैतिक कार्यकर्ता थे लेकिन रामायण मेला सहित धार्मिक आयोजनों से दुखित वर्मा जी डॉ. लोहिया से राम, रामायण सहित धार्मिक मुद्दों पर बहस कर सोशलिस्ट पार्टी छोड़ खुद राह बना अर्जक आंदोलन खड़ा कर दिए।

मैं खुद घोर धार्मिक था।कोलकाता के बड़ा बाजार स्थित गोविंद भवन से मैं तुलसी दास कृत रामचरित मानस,विनय पत्रिका,दोहावली आदि खरीद लाया था,जब छठवीं क्लास में पढ़ता था। मैं सरस्वती सहित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित कर पूरे भाव से इनकी पूजा-अर्चना करता था लेकिन 1990 में रामस्वरूप वर्मा जी की “ब्राह्मण महिमा क्यो और कैसे?” ने मेरी धारा और धारणा ही बदल डाली।

“ब्राह्मण महिमा क्यो और कैसे” में वर्मा जी ने रामचरित मानस का स्पष्ट रूप से पोस्टमार्टम कर डाला है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी व राष्ट्रपति वीवी गिरी जी को लिखे पत्रों का संकलन है यह पुस्तक जिसमें तुलसी दास जी की इस श्रेष्ठतम किताब “रामचरित मानस” की बखिया उधेड़ डाला है रामस्वरूप वर्मा जी ने।

रामस्वरूप वर्मा जी की इस किताब को पढ़ने के बाद मैं अगले चरण में लखनऊ के अमीनाबाद के गुइन रोड स्थित कल्चरल पब्लिशर्स से सच्ची रामायण,सच्ची रामायण की चाभी, प्राचीन भारत मे गोमांस भक्षण सहित फुले,पेरियार,अम्बेडकर आदि की जीवनियां खरीद लाया और फिर शनैः-शनैः रामस्वरूप वर्मा जी के बताए रास्ते पर चल पड़ा।


सामाजिक क्रांति के इस महानतम क्रांतिवीर महामना रामस्वरूप वर्मा जी को उनकी जयंती पर कोटिशः नमन एवं श्रद्धासुमन समर्पित है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका ‘यादव शक्ति’ के प्रधान संपादक हैं।)

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