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कहानी उस दिन की जब लालू-नीतीश ने शुरू की थी सामाजिक न्याय की लड़ाई

बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद जेएनयू में लगातार गोष्ठियां हो रही थीं, लोग मार्च निकाल रहे थे। उसी दौरान एक परिचर्चा में प्रो. बद्रीनारायण ने जो कहा, उसे आज याद करने की ज़रूरत है, “जनता ने बड़ी उम्मीदों से यह मैंडेट गठबंधन को दिया है, और लालू-नीतीश दोनों के लिए इस विजय को संभाल के रखने की ज़रूरत है”। एक साथी ने इनबॉक्स में हमारे एक जुलूस की दैनिक भास्कर में छपी एक पुरानी तस्वीर डाल कर पूछा है कि आप लालू के प्रति साफ्ट क्यूं हैं, तो मेरा कहना है कि सेलेक्टिव टारगेटिंग के ख़िलाफ़ कोई आज से बोल रहा हूं? बात किसी के प्रति नरम रहने या किसी के प्रति भभकने की नहीं है। असल बात किसी बात को पूरे परिप्रेक्ष्य में एक नज़रिए के साथ देखने की है। बाक़ी, किसी दल का सदस्य नहीं हूँ, एक जनसंगठन का हिस्सा हूं, अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी समझता हूं।

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दिक्कत यह है कि येचुरी जी और डी. राजा जी लालू जी के साथ खड़े हों, नीतीश कुमार के गच्चा देने पर एक्सक्लुसिव रिएक्शन दें, तो बहुत ठीक, और मेरे जैसे छात्र वाजिब बात बोलें, तो कनेक्शन जोड़ते हो भाई। ग़ज़ब है। जेएनयू के लोग तो इतने खोखले व तंगदिल नहीं हुआ करते। जब सारे देश में ही विपक्ष को शंट करने की कवायद चल रही है, तो हम हर उस निर्भीक व मुखर आवाज़ के साथ खड़े होंगे, जिन्हें दबोचने-दबाने की साज़िश चल रही है, जिनके साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है। यह वक़्त की मांग है। मैं ऐसे हालात में घनघोर शुद्धतावादी रवैया अपनाने का हिमायती नहीं हूँ, किसी का मूल्यांकन भी निरपेक्ष नहीं हो सकता। किसी ने कोई विसंगति-अनियमितता की है, तो न्यायालय अपना काम करेगा।

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बिहार में दस साल नीतीश ने संघ को अपना पैर पसारने का भरपूर अवसर मुहैया कराया व शासकीय संरक्षण दिया। मैंने लालू को लगातार पांच चुनाव में शिक़स्त खाते देखा है, पर विचारधारात्मक स्तर पर, धर्मनिरपेक्षता के मामले में लड़खड़ाते कतई नहीं। जब नवंबर 2015 में बिहार चुनाव के परिणाम की घोषणा के दिन ही पटना से दिल्ली लौट रहा था, तो पोस्टल बैलट की गिनती के साथ ही जो भद्दा मज़ाक मेरी बागी में शुरू हुआ, वो बयां नहीं कर सकता। एक सहयात्री अधिकारी ने तो यहाँ तक कहा कि “इ ललुआ तs बेचारा नीतीशो कs सोध लिहलिस”, फिर ‘भो’ और ‘ड़ी’ अक्षर के बीच जो चटखारे लेकर ‘स’ का इस्तेमाल किया गया, तो मन में आया कि यह आदमी लालू और उनकी आरंभिक लड़ाई के प्रति कितना विद्वेष जमा करके रखा हुआ है। पर, जैसे ही नतीजे स्पष्ट होने लगे, उनका चेहरा मुक्केबाज़ी में ताबड़तोड़ घूंसे खाए खिलाड़ी की तरह हो गया।

https://youtu.be/9wHAFlvrGB0

ट्रेन में भाई विवेकानंद से लगातार बात हो रही थी, दोनों की नज़र ईटीवी के अपडेट्स पर बनी हुई थी। एक समय उन्होंने कहा, अब बधाई स्वीकार कीजिए। ट्रेन में ही मैंने जेएनयू के अपने प्रगतिशील साथियों – अरविन्द भाई, मुलायम सिंह, राजेश मंडल, राजेश भाई, अमित कुमार, आदि से बात की कि आज एक “मार्च फार सोशल जस्टिस एंड कम्युनल हारमनी” निकल ही जाए। फेसबुक पर सुशील भाई ने चुटकी भी ली कि बिहार में कामरेड लोग ख़िलाफ़ में चुनाव भी लड़ोगे, और लड्डुुओ खाओगे, चोलबे ना रे जिज्ञासु, चोलबे ना।
मतगणना के आरंभ में ब्रह्मपुत्र हास्टल में टीवी रूम में जो माहौल था, वो कभी मुलायम सिंह की ज़बानी सुनिएगा, तो दिलचस्प लगेगा। असीम हुल्लड़बाज़ी के बीच दोपहर तक पाकिस्तान का वीज़ा बनवा देने के लिए बिन मांगे मदद देने को तैयार बैठे कुछ दरियादिल फील्ड छोड़ के, अपना ग़म भुलाने इंडिया गेट की तरफ निकल चुके थे।


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पटना से जब मैं जेएनयू पहुँचा, बाक़ी लोगों के साथ पंखुड़ी, लेनिन, सारिका, हामिद, फ़ैयाज़, आनंद, प्रतिम, अरुण और बहुत से साथी गोदावरी पर पहले से ही पटाखे के साथ तैयार थे। एक राउंड शाम में ही कुछ हास्टल के बाहर-बाहर हम घूम लिए। फिर रात को कौन उस मार्च में शामिल नहीं था ! एक को छोड़कर (हालांकि उनमें से भी कई साथी शरीक हुए थे) तमाम प्रगतिशील जनसंगठनों के साथी और बड़ी तादाद में किसी संगठनविशेष से असंबद्ध मित्र उस जुलूस में शामिल हुए। हम फ़िरकापरस्त ताक़तों के धराशायी होने की ख़ुशी मना रहे थे।

नीतीश कुमार आज मनमानी करें, लुढ़कने लगें, तो उनके विरोध में स्वाभाविक रूप से बोलेंगे। इतिहास गवाह है कि 94 में जब नीतीश अलग हुए थे, तो लालू पर कोई दाग़ नहीं था, और 15 में जब गठबंधन किया, तो लालू प्रसाद चुनाव तक नहीं लड़ सकते थे। अभी तेजस्वी पर हुए एक एफआइआर में ही अलबलाने लगे। इसको नीतीश की नैतिकता कहेंगे, तो फिर हिपोक्रसी किस चिड़िया का नाम है?

नीचे कोमेंट बाक्स में दैनिक भास्कर में छपी जुलूस की वह तस्वीर दे रहा हूँ जिसमें मुझे देख मेरे कुछ अनन्य मित्र मेरा ‘कनेक्शन’ ढूँढने में लगे हैं। उनकी जिज्ञासा को सलाम ! हाहाहा, कबिरा तेरे देश में भांति-भांति के लोग…

 

लेखक सेंटर फार मीडिया स्टडीज़, जेएनयू में शोधार्थी हैं।
इ-मेल : [email protected]

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