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बाबा साहेब से कूड़ा उठवाना मनुस्मृति का एक्शन प्लान है…

सवाल यह नहीं है कि एक अदने से स्टार्टअप अंत्योदय ग्रुप ने बाबासाहेब का अपमान करने की हिम्मत क्यों की? मेरा मुद्दा यह है कि ब्राह्मणवादी सरकार ने विरोध की गंभीरता और उससे जुड़ी आपत्तियों की संभावनाओं का पूरा आकलन करके ऐसे विवादास्पद कॉन्सेप्ट को प्लॉट क्यों करवाया?

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सरकार के कारिंदों और सत्तानशीनों ने ये क़वायद ठीक उस समय शुरू की है जब एक संघी दलित को राष्ट्रपति पद पर कुछ दिन पहले ही बिठाया गया है। एक तरफ सवर्ण वर्ग लामबंद होकर सामाजिक न्याय को नकार रहा तो दूसरी तरफ गाँधी का एक हरिजन राष्ट्रपति बनाया गया ताकि जब आप जातिवाद पर सवाल करें तो वो बोल सकें कि देखो देश का प्रथम नागरिक उच्च पद पर आसीन व्यक्ति एक दलित है।

आपके ज़रूरी सवाल नकारें जा सकें, बोलने के हक़ को भी मारा जा सके, सवर्ण एट्रोसिटी के मामले छुपाए जा सकें उसके लिए ये चमकीला टेप काम आता जिस पर श्री राम लिखा है। ये श्री राम टेप का एडहेसिव नागपुरिया है इसलिए मनुस्मृति एक्शन प्लान के तहत ही ये काम हुआ। इस पोस्टर के रूप में एक बड़ा सा पत्थर फेंका गया है बहुजनों पर और अब आपकी प्रतिक्रिया देख रहें हैं।

तो ये घटियापन करवाया गया है संघी खेमे से आने वाले युवाओं के समूह से। एक स्टार्टअप है-अंत्योदय ग्रुप, जिसके संस्थापक हैं सौरभ पांडा। ये अंत्योदय ग्रुप एक व्यवहारिक हस्तक्षेप स्टार्टअप है (Behavioral intervention start up) जो बिहेवियर चेंज कम्युनिकेशन प्रोगाम द्वारा स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाने के लिए एक पायलेट प्रॉजेक्ट के तहत लोगों के व्यवहार को बदलने की कोशिश की बात कह रहा है। सौरभ पांडा एंड कंपनी का अंत्योदय ग्रुप एक अदना सा स्टार्टअप है, ये समझने की गलती मत कीजिएगा।

इस पायलेट प्रॉजेक्ट आईडिया को फाइनेंस और प्लॉट करने में इनकी मदद कर रहा है AA communication। अब AA communication की ख़ास बात ये है कि ये गड़करी की बी कम्पनी है। अब गड़करी ने इस आईडिया को प्लेटफॉर्म दिया है तो इसका नागपुरिया कनेक्शन इसे इतना दम भी देता है कि वो सौरभ पांडा इतने विरोध पर भी माफ़ी नहीं मांग रहा। ये स्वच्छ भारत अभियान जितना सफ़ाई का दिखता है उतना है नहीं।


2 अक्टूबर 2014 को मोदी ने गाँधी के चश्मे को सामने रखकर गाँधी की प्रतीकात्मक उपस्थिति के साथ स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया था। सफ़ाई अभियान के नाम पर झाड़ू के साथ सेल्फी-फ़ोटो के साथ सफ़ाई का ढोंग दिखाते हाईप्रोफाइल सवर्ण लोग इसके ब्रांड एम्बेसडर बने, जिसमें एक भी दलित नहीं था। पिछले तीन साल में ये सरकार की फ्लैगशिप प्लानिंग में शामिल है और हर साल कुल बजट का 8% आवंटन इस योजना के लिए ख़र्च किया जा रहा है।

गाँधी जो खुद वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे, इस अभियान के अगुआ दिखाये गए फिर तीन साल में परिवर्तन ये आया कि अब उन्हें कचरा डालने के लिए बाबासाहेब को लेकर आना पड़ा। दसअसल मनुस्मृति एक्शन प्लान के तहत यही करवाया जाना था, सब कुछ स्टेप बाय स्टेप है। बस पहले माइंड मेकअप के लिए गाँधी दिखाया, जिससे एक बड़ा तबका सफ़ाई के नाम पर सचेत हो गया तो धीरे से अम्बेडकर ले आए।

जिन्हें लग रहा कि ऐसे ही पोस्टर तो गाँधी और बाहुबली का भी है तो उनके लिए यही कहूँगी- गाँधी या बाहुबली की पीढियों ने अछूतों का जीवन नहीं बिताया, ना ही उनकी पीढ़ियाँ अब तक भी गटर में मर रही, ना ही उनकी वजह से दलित इंसान माने जा रहे… वो ऊठाएँ कचरा उन्हें इम्पोर्टेंस मिलेगी पर एक अपनी जाति की वजह से घृणा के साथ अछूत कहलायेगा। एक जैसे ही सवाल या स्थिति पर दलित और सवर्ण को एक जैसे मायनों में रखा जाना दअरसल धूर्तता है।

जिन लोगों की पीढ़ियाँ गटर में घुट कर और संडास साफ़ करते हुए मर गई उन्हें इस स्वच्छता अभियान में सवर्ण बता रहे थे कि देश को साफ रखना है। कचरा करने वाली सवर्ण जमात ने हाथोंहाथ स्वच्छ भारत अभियान को लिया और मोदी को सिर माथे चढ़ाते हुए मनुस्मृति एक्शन प्लान की तरफ कूच कर दिया। इस अभियान पर मुझे हमेशा से आपत्ति रही क्योंकि देश साफ करने के नाम पर दलित समुदाय के लोगों पर सफ़ाई का काम थोपा जा रहा था। अब स्वच्छता सरकारी कार्यक्रम था और सफ़ाई दलितों को ही करनी थी, फिर वो चाहें या ना चाहें।

स्वच्छ भारत अभियान चलता, ना चलता, पर सफाई करने वाले लोग कौन होंगे ये निर्धारित है। सफाईकर्मियों की जमात में सवर्ण तो नहीं ही है, ना पहले थे और ना ही अब। सेप्टिटेंक-मैनहोल सीवेज में घुट कर मरने वाले लोग सब दलित ही हैं, जो देश को साफ़ करते हुए मर गए। हर साल लगभग 22000 से ज़्यादा दलित अपनी जान गँवाते हैं। अभी कल ही मध्यप्रदेश के देवास में सेप्टिटेंक में घुट कर 4 सफाईकर्मी मर गए। स्वच्छ भारत अभियान के तहत करोड़ों अरबों रुपए आवंटित होने पर भी सफ़ाई व्यवस्था में मशीनों का प्रयोग शुरू नहीं हुआ, ना सफाई कामगारों की ज़िंदगी में कुछ बदलाव आया।

भारत को साफ रखने का ठेका तो मनुस्मृति के पहले से ही अछूतों को दे दिया गया, वही ठेका आगे भी चला। मनुस्मृति से इसे लिखित तौर पर और पुख़्ता बना दिया गया ताकि अछूतों के तरफ से विरोध या सवाल की कोई संभावना ही ना रह जाए। चूँकि संविधान लागू होने के बाद से परिवर्तन की धीमी कोशिश ही सही दलितों ने पढ़ना-लिखना, हक़ माँगने की शुरूआत कर दी थी, तो सवर्णों को ये बात क्यों हज़म होती, फ़िर आरक्षण के चलते चमहार-महार उनका बपौतिया हक़ (जो उनका बाप मनु दे गया था) मार रहे थे।

अब जबकि दूसरी पीढ़ी के बाद तीसरी पीढ़ी के चंद दलित स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटीज़ में आना शुरू हुए तो ये बर्दाश्त के बाहर ही था सवर्णों के। ऐसे ही नहीं रोहिथ वेमुला, जिशा, डेल्टा मेघवाल मरते हैं, उनकी लाशें काफ़ी हैं बाकियों का मनोबल तोड़ने के लिए। उन्हें मारा गया इसलिए ही कि तुम जो हर तरह से टॉर्चर झेल लेने के बाद भी कोशिश कर रहे ना आगे आने की वो उम्मीद भी छीनेंगे हम।

ऐसे ही नहीं कह रहें हैं- अपने अंदर के बाबासाहेब को जाग्रत करिए, कूड़ा कूड़ेदान में ही डालिये। बाबासाहेब उसी समुदाय का नेतृत्व करतें हैं इसलिए उन्हें सामने रखकर दलितों को उनके काम के लिए संबोधित करना ज्यादा कारगर लगा। वो मान कर चलते हैं कि दलित चाहे जितना भी पढ़ लिख जाए है वो उनकी कचरा-पट्टी-टट्टी ऊठाने वाला ही है। सभ्यता के विकास क्रम में सवर्ण कितना भी ऊँचा ऊठने का सपना देखे, दलितों के सपने डस्टबिन से ही जुड़ें रहें और कूड़े पर आकर ही ख़त्म हों।

 

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