fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
विमर्श

डेरे का फेरा: भक्ति इतना न करो कि होश खो दो

इस देश के त्रासदी यह है कि जिन लोगो के लिए आप काम करते है वो भी समय आने पर बाबाओ की अफीम के मज़े लेने चले जाते हैं और नतीजा है सिरसा. राम रहीम एक निशानी है उस बड़ी बीमारी का जिसका इलाज़ हमारे ‘डाक्टर’ करना नहीं चाहते. इस देश के लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा आज अगर किसी से है तो वो है इन बाबाओं से, जिनका मूल उद्देश्य इस देश में मनुवाद की स्थापना कर मानववादी संविधान को ख़ारिज करना है. हमारे सभी नेता जिनकी लोकतंत्र में कोई आस्था नहीं इन बाबाओं के जरिये जनता के वोट खरीदते हैं. राम रहीम ने पिछले चुनावो में भाजपा को वोट देने की अपील की थी जिसके परिणामस्वरूप मनोहर लाल की नकारा सरकार ने उन्हें 200 कारों के काफिले के साथ पूरे शाहान्शाई तरीके से कोर्ट में एंट्री दी और फिर उन्हें बलात्कारी होने के अपराधी घोषित करने के बाद बाकायदा राज्य सरकार के आथित्य में एक गेस्ट हाउस में रखा गया है. इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या होगी कि हिंदुत्व के प्रहरियो की जुबान में ताले लगे हैं और जो कुछ बोल रहे हैं वो बाते इधर उधर घुमा के बात कर रहे हैं.

Advertisement

संघियों को ये समझ लेना चाहिए कि उन्हे जनता को भडकाना आता है उससे ज्यादा कुछ नहीं. शासन चलाने के लिए जो वैचारिक प्रतिबढता होनी चाहिए वो उनके पास नहीं है. संकीर्ण मानसिकता के सहारे आप भारत जैसे विशाल बहभाषी, बहुसांस्कृतिक देश को नहीं चला सकते. संघ न तो देश की विविधता का सम्मान करता है और न ही इसकी सेक्युलर विरासत का. उनके लिए हर एक बात में पाकिस्तान, वन्देमातरम और मुसलमान की बाइनरी चाहिए. जो हरियाणा में हुआ क्या वो किसी आतंकवाद से कम था जिसमे सरकार की पूर्ण भागीदारी थी. हरियाणा और चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने सरकार को लगातार निर्देश दिया था कि वो सुरक्षा के पूर्ण इंतज़ाम करें लेकिन खट्टर सरकार ने कुछ नहीं किया. आज पंचकुला और सिरसा में व्यापक हिंसा के बाद जिसमें अभी तक 32 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और करोडो की सम्पति का नुकसान हुआ, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इसकी वसूली राम रहीम से करने की बात कही है. क्या खट्टर सरकार की हिम्मत है कि वो हाईकोर्ट के आदेश पर तुरंत अमल करेगी?

डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी अपने गुरु की रिहाई के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जा सकते हैं लेकिन आज की हिंसा के लिए राम रहीम सिंह पर मुकदमा चलना चाहिए. शर्मनाक यह है भाजपा के नेता साक्षी महाराज इसके लिए कोर्ट को दोषी ठहरा रहे हैं. सवाल यह है के ऐसे नेताओं के चलते जो बीज भाजपा और संघ देश में बो रहे हैं वो देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए खतरा है. भारत में एकता की गारंटी यहां का संविधान है और उसके अनुसार देश में लोगो को मानववाद, वैज्ञानिक चिंतन, पर्यावरण संरक्षण, महिलाओ का सम्मान, धर्मनिरपेक्षता हमारे राष्ट्रीय कर्तव्य हैं लेकिन पिछले तीन वर्षो में तो ऐसा लगता है कि ये शब्द हमारी सरकार के लिए सबसे खतरनाक हो गए. देशभक्ति, राष्ट्रवाद, गौसेवा, गंगा, पाकिस्तान की चर्चा करने वाले संघ के मठाधीश क्या हरियाणा और पंजाब में हुई हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा करेंगे या नही? क्या अपने देश के लोगों को घर जला देना, पुलिस के गाड़िया फूंकना, न्यायालय में हिंसा, मीडिया पर हमला, राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुचना, राष्ट्रद्रोह नहीं है? कन्हैया कुमार और उमर खालिद पर देशद्रोह का मुक़दमा केवल उनके भाषणों के कारण लगा जो सरकार को पसंद नहीं थे. हरियाणा में भगाना के दलितों ने जाटो के हिंसा का विरोध किया तो उन पर देशद्रोह का मुकद्दमा लगा लेकिन गुरमीत राम रहीम के गुंडों ने लोगो के घरो को जला दिया, आगजनी की, बसे फूंकी लेकिन वो ‘देशभक्ति’ है. जो संघी और भाजपाई टीवी बहसों में बिना सोचे समझे किसी पर भी अनर्गल आरोप लगाने में विशेषज्ञ है वे अभी राम रहीम के मामले में ‘शांति’ की अपील कर रहे हैं. कोई झा साहेब टी वी पर कह रहे थे कि जज को अपना निर्णय देर से देना चाहिए था, उन्हें कोर्ट परिसर से भीड़ हटवाने का आदेश देना चाहिए था. क्या हाईकोर्ट लगातार हरियाणा सरकार को आगाह नहीं कर रहा था?

हम सभी शांति चाहते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि राम रहीम पर मुकदमा न चले या उन्हें सजा न हो ? उन्हें न्याय प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और उनके पास वकीलों की कोई कमी नहीं होगी क्योंकि पैसे की कोई कमी नहीं है. इसलिए उन पर लग रहे आरोपों को सुप्रीम कोर्ट तो सिद्ध होना पड़ेगा तभी अंतत वह अभियुक्त होंगे लेकिन आज की हत्याओं और आगजनी के लिए राम रहीम पर और मुकदमे दर्ज होने चाहिए. हरियाणा की निकम्मी खट्टर सरकार का ये चेहरा दूसरी बार सामने आया है जब सरकार ने जानते हुए भी कोई कार्यवाही नहीं की.

आज के पूरे घटनाक्रम को एक दूसरे नज़रिए से भी देखने की जरुरत है. वो ये कि इस देश में ईमानदारी से काम करने पर आपको सजा मिलती है और वो ही लोग आपके साथ नहीं आते जिनके लिए आप लड़ते हैं. जंतर-मंतर में हमने आसाराम बापू और रामपाल के चेलो को बहस करते देखा है. अब तो वहां पर भी एक और नए बाबा के भक्तों की भीड़ होगी. प्रश्न है कि देश में जब बच्चे अस्पताल में मरते हैं या कही अन्याय होता है तो कोई एक कदम बढाने को तैयार नहीं होता? क्या इस देश का यही चरित्र है? शर्मनाक है? क्या इस देश में वाकई में अब जनता के कोई प्रश्न बचे नहीं है, कि लोगो के पास बाबाओं के चक्कर लगाने और उन्हें पैसे देने का पूरा समय है लेकिन अपनी समस्याओं पर बात करने के लिए राजनीतिज्ञों से सवाल करने का वक़्त नहीं है और जो सामाजिक संगठन या कार्यकर्ता कार्य कर रहे हैं उनके साथ सहयोग का तो मतलब ही नहीं है. मतलब ये कि गाँव में स्कूल बनाने के लिए आपको कोई सहयोग नहीं मिलने वाला लेकिन एक मंदिर बनाने के लिए लोग बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं.


भारतीय लोकतंत्र के लिए ये शर्मनाक दिन है जब एक राज्य सरकार ने न्यायालय के लगातार कहने के बाद भी कार्यवाही नहीं की. इस लिहाज से हरियाणा का प्रशासन, मुख्यमंत्री न्यायपालिका की अवमानना के दोषी हैं. खट्टा को जितनी जल्दी रिटायर किया जाय उतना अच्छा. भाजपा को चाहिए के साक्षी जैसो को नियंत्रित करे नहीं तो जनता के सब्र का बांध टूट सकता है.

भक्तों से केवल यही कहना है कि किसी के भक्ति इतना न करो को होश खो दो. मैं तो सीधे कहता हूँ, कि पंजाब जहा से ग़दर आन्दोलन निकला, जहाँ से सिख गुरुओ ने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध परचम लहराया, जहाँ से हजारो की संख्या में लोगो ने बाबा साहेब आंबेडकर के आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, उस पंजाब में अकालियो ने धर्म की राजनीती की और उसके काउंटर में ब्राह्मणवादी ताकतों ने डेरो को आगे बढ़ाया. आज डेरे पंजाब की राजनीति को नियंत्रण करने के एक बड़ा तरीके हो गए हैं . अब इन डेरो का असर हरियाणा में ज्यादा हो गया है इसलिए ये किसी भी जाति के हों लेकिन मनुवाद को ही मज़बूत कर रहे हैं. आश्चर्य इस बात का है के इतने भगवानों के होने के बावजूद भी हमारे लोग नए भगवानों की तलाश में हैं. बात साफ़ है कि लोगो को लगातार ठगने के बावजूद भी ‘भगवानो’ के ‘चमत्कार’ पर भरोसा है और यही हमारे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की हार भी है क्योंकि न हम उनमे वैज्ञानिक चिंतन विकसित कर पाए और न ही लोकतान्त्रिक व्यवहार की आदत. परिणाम आज साफ़ दिखाई दे रहे हैं, देश के लिए खतरे की घंटी है. देश के राजनितिक नेताओं को अब साफ़ तौर पर धर्म की धंधेबाजो से किनारा करना होगा और लोगों में राजनैतिक परिपक्वता लानी पड़ेगी. चमत्कारों के इंतज़ार में इस देश में बहुत भयानक त्रासदी लगातार आती रहेंगी और हम लोग असहाय होकर इन घटनाक्रमों को देखते रहेंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं। विद्या भूषण रावत स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved