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क्या हिन्दू शासकों से बेहतर थे मुस्लिम/ईसाई शासक?

आगरा फोर्ट का भ्रमण अपने छोटे बेटे कुणाल भूषण के साथ किया। दीवाने आम, दीवाने खास सहित विभिन्न महलों व ऐतिहासिक भवनों को देखकर लगा कि मुगलों ने जो किले व स्मारक बनवाये वे कितने उम्दा किस्म के हैं कि 400 वर्ष से ज्यादा समय बाद भी अपनी भव्यता कायम किये हुए है।

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राज तो बहुत सारे लोगों ने किया है पर इतिहास किसी-किसी ने बनाया है। मुगलों और अंग्रेजो के राज की हम सराहना तो नहीं कर सकते, पर इतना जरूर कह सकते हैं कि हिन्दू राजाओं का इतिहास में नाम किसी उच्चकोटि के काम के लिए (मन्दिर बनाना छोड़कर जो 85% आबादी को गुलाम बनाने का उपक्रम है) शायद ही दर्ज हो, हां उनका नाम स्त्रियों के अपहरण, जबरन शादी आदि के लिए राज्य दांव पर लगाने का जरूर है। हिन्दू राजाओं का इतिहास स्त्रियों को भोग की वस्तु बनाने हेतु उन्हें जीतने-हारने के है, देश की बहुत बड़ी आबादी को दासत्व की जंजीरो में जकड़े रहने का है।

गोरी-गजनी भारत आये और लूटकर चले गए लेकिन इनके बाद के शासकों से होते हुए मुगलों का आना देश मे हिन्दू राजसत्ता का पतन जरूर रहा लेकिन यह देश के बहुत बड़े वंचित हिन्दू समुदाय के अभ्युदय का वाहक भी बना। हिन्दू राजाओं के पराजय और मुस्लिम शासको की राजसत्ता ने इस देश के प्रभु वर्ग से सत्ता छीन करके उन्हें गुलाम बनाया जो इन प्रभु वर्ग के पूर्व से गुलाम लोग (पिछड़े/दलित/आदिवासी) थे वे इन मुस्लिम शासको के आने के बाद थोड़ा राहत व सकून जरूर पाए। मुस्लिम/मुगल शासको के राज में हिन्दू राजाओं के शासन काल मे मनुवाद से कराह रहे लोगो को दो सहूलियतें मिलीं,एक यह कि वे धर्म त्याग करके सदा-सदा के लिए मनुवाद से मुक्त हो जांय,इस सहूलियत का लाभ उठा करके देश की लगभग 15 प्रतिशत वर्तमान आबादी जो मुसलमान है वह इस्लाम कबूल कर मुसलमान बन मनुवाद की केंचुल सदा-सर्वदा के लिए नोच फेंकी,दूसरा यह कि जो लोग मनुवाद की केंचुल को फेंक न सके वे हिन्दू बने रह करके भी पढ़ने-लिखने का सीमित अवसर पाकर थोड़ा पढ़-लिखकर के न्यून मात्रा में ही सही सकून पाए।

मुगलों के अंतिम शासक बहादुर शाह जफर भारतीय मिट्टी में ऐसे रच-बस गए कि वे भारत हेतु अपनी अतुलनीय कुर्बानी दे दिए जिसका मुकाबला कभी भी सावरकर या गोलवरकर नही कर सकते।मुस्लिम/मुगल शासको ने देश की बहुत बड़ी आबादी को उन्मुक्त हवा और वातावरण प्रदान करने के साथ साथ कुतुबमीनार, जीटी रोड, ताजमहल, लाल किला, आगरा फोर्ट, फतेहपुर सीकरी बुलन्द दरवाजा/फोर्ट आदि ऐतिहासिक धरोहरों को दिया जिसे आज भारत गर्व से दिखाता है और विश्व के आश्चर्यजनक सत्यों में शुमार है।

मुगलों की तरह ही अंग्रेजो ने देश को गुलाम तो बनाये रखा और समस्त प्राकृतिक संसाधनों का जबर्दस्त दोहन किया लेकिन सारी आधुनिक तकनीक देश को मुहैया भी कराया।स्कूल कालेज खोला, सबको बिना भेदभाव के पढ़ने का अवसर दिया जिससे मेरी पहली पीढ़ी अर्थात मेरे पिताजी मिडल तक अंग्रेजी राज में पढ़ सके। मुगलों और अंग्रेजो ने देश को गुलाम बनाने के बावजूद 85 प्रतिशत दास श्रेणी के हिंदुओं को अमृत की बूंदे सुलभ कराया जिसके आचमन की कोशिश करते हुए शम्बूक, एकलब्य, रावण, बलि, हिरणकश्यप, महिषासुर, राहु-केतु आदि ने शहादत दिया। इन अमृत की बूंदों (शिक्षा) का गागर नही बल्कि सागर उढेल दिया इन गुलाम बनाने वाले मुस्लिम मुगल/ईसाई अंग्रेज शासकों ने।


मुस्लिम मुगल शासकों की तरह ही अंग्रेजो ने देश को रेल, जहाज, तोप/आधुनिक शस्त्र, उच्च कोटि के शिक्षण संस्थान, सन्सद भवन, राष्ट्रपति भवन आदि ऐतिहासिक संसाधन/सम्पत्ति दिया। अंग्रेजो के कारण ही अम्बेडकर जैसा दुनिया का महान विद्वान मिला जिसने हमारी मनुवादी विधान द्वारा हाथों-पैरों, दिल-दिमाग मे जकड़ी बेड़ियों को खोला।

आगरा फोर्ट देखने के बाद हिन्दू/मुस्लिम/ईसाई शासकों के गुलामी के वे दिन और उन दिनों की त्रासदी और सहूलियतों का तुलनात्मक स्वरूप जेहन में उमड़ने-घुमड़ने लगा। आगरा फोर्ट, ताजमहल, फतेहपुर सीकरी फोर्ट व बुलन्द दरवाजा ने उस काल के शासकों की सृजनकारी तबियत को जहां बयां करता वहीं उनकी समतावादी नीति को भी सोचने हेतु विवश किया है।

हम आज मुस्लिम/अंग्रेज शासको से मुक्त हो पुनः कट्टर हिन्दू शासको द्वारा शासित हैं। अब कई सौ वर्षों बाद जब दुनिया चांद पर पँहुचने के बाद मंगल की यात्रा पर जाने हेतु प्रयत्नशील है तो हमारे कट्टर हिन्दू शासक हजार वर्ष पहले की स्थिति में देश को ले जाने हेतु गाय, गंगा, गोमूत्र, वेद, पुराण, वैदिक संस्कृति, राम आदि को इशू बनाये हुए हैं। मनुवाद को पुनः सिंचित करने की फिराक में हिंदुत्ववादी लोग हैं। गजब तमाशा है और देश की वंचित आवादी भी अजब है जिसे धार्मिक गुलामी में मजा ही मजा है।

आगरा फोर्ट का दर्शन हमे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई शासन दर्शन पर सोचने हेतु विवश किया है जिसे विगत काल मे हमारे पुरखो ने भुगता है और वर्तमान में हम भुगतने को त्रस्त हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। चंद्रभूषण सिंह यादव त्रैमासिक पत्रिका ‘यादव शक्ति’ के प्रधान संपादक हैं।)

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