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जब सत्ता रुलाती है तो लैंगिक भेद कहां देखती है…

एक मुद्दे पर एक वर्ग की महिलाओं का बहनापा बढ़ा, पितृसत्ता के एक पक्ष पर बात हुई अच्छा है। लेकिन इन सबके बीच जब जबरन के आंसू के साथ समर्थन में सेल्फी पोस्ट हुई तो अपने खास सरोकारों के तहत तिलमिलाहट हुई। मर्द को दर्द नहीं होता टाइप इस मध्यवर्गीय पाठ का क्या करें। जब छोटी थी तभी गुजरात दंगों के समय एक मर्द की डर से रोती हुई तस्वीर पर नजर ठहर गई थी। एक डरा हुआ, जान की भीख मांगता मर्द।

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जब सत्ता रुलाती है तो लैंगिक भेद कहां देखती है। अखलाक के बेटे और भाइयों के आंसू, अभी हाल में जुनैद के अब्बा, भाइयों के आंसू देखे थे। खुदकुशी करने के पहले मर्द किसान कितने आंसू रोया होगा पता नहीं। नोटबंदी के समय मेट्रो स्टेशन के बाहर उस रिक्शेवाले के आंसू देखे थे जिसने मुझे पैदल जाते हुए देख कर कहा कि दीदी, जितने खुदरे पैसे हैं उतने ही देना, पर रिक्शे पर बैठ जाओ कल से कुछ खाया नहीं है।

अपने पेशेवर सहयोगियों को भी रोते देखा है। बिना वजह आपको टर्मिनेशन लेटर पकड़ा दिया गया और इस बात के आंसू कि अब बीवी-बच्चों के सामने किस मुंह से जाऊंगा। एपरेजल लेटर देख के आंखों से निकले आंसू कि बेटी के स्कूल की फीस बढ़ गई लेकिन तनख्वाह नहीं बढ़ी।

आपकी कमजोर जाति और कम तनख्वाह के कारण सवर्ण प्रेमिका ने छोड़ दिया तो उसके आंसू। उस दूल्हे के आंखों से हताशा में निकले आंसू की तस्वीर देखी है जिसे, उसकी जाति के कारण घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया गया। स्थानीय थानों में देखें, आंसू निकाल कर गिड़गिड़ाते बाप को कि मेरी बेटी के साथ बलात्कार का मामला दर्ज कर लो।

मेरे दफ्तर में मध्य प्रदेश के निर्मल जैन आते हैं। जब वे रोते हुए सत्ता की क्रूरता की कहानी बताते हैं तो मैं वाशरूम चली जाती हूं कि वे बुजुर्ग मेरे आंसू नहीं देख पाएं। उनके आंसुओं ने मुझे कई रात सोने नहीं दिया। अक्सर दफ्तर में कितने मर्द रोते हुए आते हैं कि हमारी स्टोरी छाप दीजिए, कुछ असर होगा।


अपने व्यावसायिक दायित्वों के कारण अक्सर कमजोर तबके के मर्दों से ही मुलाकात होती है आंसू गिराते हुए, किलसते हुए, फफक-फफक के रोते हुए। थानों के आगे, कचहरी के आगे, अस्पतालों के आगे। अभाव, अधिकारों का हनन एक खास वर्ग की नियति है और उस वर्ग के औरत और मर्द दोनों रोते हैं। कब पुलिस ने आपकी रेहड़ी उखाड़ दी, कब वो आपकी बेटी को उठा के ले गया, रोने के अलावा और कर क्या सकते हैं।

लेकिन उच्च मध्यवर्ग तबके के सेल्फी लेने के ऑबशेसन का क्या करें, वो नकली आंसुओं के साथ सेल्फी डालता है। लेकिन मुझे ये नकली आंसू एक बड़े वर्ग के दर्द और संघर्ष का मजाक लगा जो अक्सर रोता है। जब स्टिल फोटो से दिक्कत नहीं तो सेल्फी से क्यों होगी, लेकिन अपनी आत्ममुग्धता में जब आप नकली आंसू लाते हैं तो फिर क्या कहा जाए।

खैर, अपने-अपने सरोकार हैं। आप किसी पर भी बात करने के लिए आजाद हैं। लेकिन जब आपका सेल्फ (सेल्फी) उस आंसू का मजाक उड़ाने लगे जो एक बड़े सामूहिक की नियति है तो बोलना जरूरी होता है। डर और आंसू की बहुत सी नेचुरल तस्वीरें हैं, उसका ही इस्तेमाल कर लेते तो बेहतर होता। भारत विभाजन, भोपाल गैस कांड, सिख विरोधी, गुजरात, मुजफ्फरनगर इस देश ने आंसुओं की बहुत सी नेचुरल तस्वीरें दी हैं। अभी और आने वाली हैं।

एक बात यह भी है कि किसी भी ग्राउंड पर महिलाएं जब अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कुछ करती हैं तो पुरुष ‘संवेदनशीलता’ उसके समांतर खड़ी हो जाती है! यह ‘संवेदनशीलता’ ईमानदार हो सकती है, लेकिन इससे आखिरी तौर पर लड़ाई भ्रमित होती है! मुझे नहीं समझ आता कि ऐसा ‘अपने-आप’ क्यों हो जाता है..! एक ईमानदार साथ लड़ाई के शुरुआती चरण में पीछे चलता है, आगे क्या, समांतर भी नहीं!

:-  Mrinal Vallari जनसत्ता में कार्यरत है ये उनके नीजि विचार हैं।

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