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‘देश में जहां-जहां तीर्थधाम हैं, वहां-वहां दलितों के लिए नारकीयता मौजूद है’

ज़िंदगी को देखने-समझने के नज़रिये और अपने अनुभव से गुने मायने ना चाहते हुए भी आपके व्यवहार को प्रभावित करतें ही हैं। शायद मैं अब तक भी इतनी परिपक्व नहीं हो पाई कि उन अनुभवों को किनारे रख निष्पक्ष भाव से व्यवहार कर पाऊं। यदि जीवन उन अनुभवों के साथ जी रहें हैं तो हिम्मत या समझदारी ज़रूरी नहीं कि काम आ ही जाए। ऐसा ही एक कंपा देने वाला अनुभव मुझे उस दिन हुआ जब मनाली में टैक्सी वाले भैया ने घूमने के लिए पहली ही जगह टैक्सी रोकी……..मनु मंदिर के ठीक सामने।

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मैं टैक्सी का गेट खोल कर बाहर आई; मंदिर के नाम का बड़ा सा बोर्ड सामने था। पहले से फ़िक्स नहीं था कि घूमने कहां जायेंगे बस जो पहले आ जाए वहीं घूम लेंगे वाला सिस्टम था। अपने सामने मंदिर और मनु का नाम देख कर ही मैं सन्न रह गई….. ऐसे लगा मानो जैसे बर्फ सी जम गई हूं, इतना जड़वत शायद पहले कभी महसूस नहीं किया था। मुझे इस से पहले वाक़ई नहीं पता था कि ओल्ड मनाली में मनु का मंदिर है, और मनाली नाम दरअसल मनु के सम्मान में रखा गया है।

यानि मनुआलय से ही मनाली बना है। लोग कहतें हैं कि इस मंदिर में मनु के धरती पर पड़े पहले कदम की छाप है। जिस मनु के वज़ह से एक पूरा समुदाय पीढ़ियों से अमानवीय जीवन जीने के लिए अब तक भी मजबूर है, उसका मंदिर मेरी नज़रों के बिल्कुल सामने था।

उस वक़्त एक ही पल में बहुजन समाज के लाखों लोगों के चेहरे एक साथ मेरे ज़ेहन में कौंध गए। मुझे दिखे मेरे बहुजन परिवार के लोग जो मनु और मनुवादियों की वजह से अब तक भी ना जाने कितने तरह के संघर्षों की चक्की में पीसते हुए, बद से भी बदत्तर जीवन जी रहे हैं। मैं वहीं खड़ी-खड़ी ऊपर जाती हुई सीढ़ियों और उस पर उतरते-चढ़ते लोगों को कुछ देर देखती रही। बहुत कोशिश की खुद को समझाने की, कि सीढ़ियों से कदम ऊपर की तरफ़ बढाऊं, देखकर आऊं कि कैसे पूरे तंत्र के साथ दुनिया का सबसे बर्बर संस्थान ज़िंदा है। पर मैं नहीं हिम्मत कर पाई। जिस जगह पर मनु का टेम्पल हो, जिस जगह का नाम ही मनु के ऊपर हो,जहां के अधिकतर गाड़ियों और घरों पर जय बाबा मनु की लिखा हो…..वहां दलितों के क्या हालात होंगें अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।


मैंने वहीं से कदम वापस लिए और बराबर से ही नीचे की ओर डाउन टाऊन जाने का रास्ता पकड़ लिया। कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद ही नीचे सड़क पर मुझे बलिराम जी मिले जो जूते-चप्पल ठीक करने का काम करतें हैं। अपने काम का सामान रखे लकड़ी के बक्से को टांगे बारिश में भीगे हुए काफ़ी परेशान दिख रहे थे। मैंने रोक कर उनसें बातें की, आखिर क्या हालात हैं वहां। मुझे वहां की सच्चाईयां उनसे बेहतर कौन बताता।

मैं डग भरते हुए उनके साथ ही हो ली, उनके घर जाकर उनकी पत्नी-बच्चों और बगल में रह रहे दूसरे भाइयों से भी बात की। पता लगा कि वहां दलित पुरुषों को ‘डूम’ और महिलाओं को ‘डुमनी’ कहा जाता है, आज भी वो मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, वे आज भी अछूत हैं, जातिवाद बहुत ही वीभत्स रूप में मौजूद है यहां। ये ना ही सामूहिक भोज में हिस्सा ले सकतें हैं, और ना ही इनके यहां कोई खाना खाता है, सबके खाने के बाद बचा खाना अलग से दिया जाता है उन्हें।

उनके घर अलग से बसे हुए हैं पुरुष मजदूरी, पत्थर तोड़ने का काम, साफ-सफ़ाई, कचरा-पट्टी और सीवरों में काम करतें हैं, चमड़े का काम करतें हैं, महिलाएं भी खेतों में काम करने जाती हैं, चारे और ऊन का काम करती हैं। पहाड़ के कठिन जीवन के बीच वहां के दलितों के जीवन की दुश्वारियां भी दुगनी हैं… जब बर्फ़ पड़ने लगती है और कोई काम नहीं मिलता तो पुरूष चंडीगढ़ में काम करने चले जातें हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं पर बाकी बच्चों से अलग बैठते हैं, उनसें स्कूल में काम करने भी कहा जाता है। मैंने असीम प्यार से भरी चाय पीने और बातचीत के बाद विदा ली उन सभी से। बहुत कुछ था उनके पास बताने और मेरे जानने के लिए पर वो सब काम करने वाले लोग थे, कितनी देर मेरे पास बैठते। मैंने और भी लोगों से बात करने की कोशिश की पर समय कम था कि कुछ और जान पाती।

देवों की भूमि कहे जाने वाले हिमाचल में शूद्रों को प्रवेश आज भी नहीं मिलता है। 1966 में पंजाब राज्य से अलग हुए इस राज्य में स्वतंत्रता के 70 सालों के बाद भी रेडिकल हिंदू वैल्यूज फॉलो किए जातें हैं। सिख साम्राज्य के समय सिख दर्शन की स्थापना को लेकर डोगरा और पहाड़ी राजाओं से सिखों के कई युद्ध हुए। बाद में आगे चलकर जब गुरू गोविंद सिंह जी ने उन्हें एक साथ मिलकर मुगलों के विरुद्ध लड़ने को कहा तो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उनकी सेना में लोअर कास्ट के लोग भी सैनिक के रूप में सम्मिलित थे।

सिख साम्राज्य के रहते हुए पहाड़ी राजा टिपिकल हिंदूवाद या मनुवादी सिस्टम को लागू नहीं कर पाए थे, क्योंकि पुजारी सिखों से डरते थे। इसलिए जब उनका यह डर मिट गया तो उन्होंने मंदिरों के बाहर दीवारों पर लिखवाना शुरू किया- ‘मंदिर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है’। इसे इस रूप में भी समझ सकतें हैं कि किसी समय में ज़रूर ही उनका प्रवेश प्रतिबन्धित नहीं रहा होगा, और वो समय सिख साम्राज्य का ही था।

स्वतंत्रता के बाद जब राज्य स्वायत्तता की स्थिति में आया तो हिंदूवाद को अपने वास्तविक रूप में लागू किया। इसलिए ही हिमाचल में दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता है। अब हिन्दूवाद को लागू करने वाले लोग कौन होंगे बताने की जरूरत है क्या? जहां कहा जाता हो कि मनु अपने जीवन चक्र में यहां सात बार मरा और सात बार ज़िंदा हुआ है, वहां बहुत से मनु ज़िंदा घूम रहे हैं।

मनुस्मृति ज़िंदा रूप में देखनी हो तो देखिए हिमाचल में, तब भी मन ना भरे तो आगे बढ़ जाइए उत्तराखंड आपका इंतजार करेगा। जहां-जहां तीर्थधाम हैं वहां-वहां दलितों के लिए नारकीयता मौजूद है। पहाड़ सबके लिए खूबसूरत नहीं हैं, कुछ लोगों की चीखें उन पहाड़ों में ही दफन रह जाती है।

(दिपाली तायडे लेखिका हैं विभिन्न सामाजिक मुद्दे पर वो लिखती रहती हैं)

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