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ये बिहार का चित्रकार कौन है?

उत्‍तराखण्‍ड, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश (और तमिलनाडु) में बीजेपी ने अपनी सरकार बनाने के लिए संविधान की धज्जियां कैसे उड़ायी थीं, अगर याद हो और आपके ज़ेहन में फांसी पर लटके हुए अरुणाचल के पूर्व मुख्‍यमंत्री की तस्‍वीर बची हो, तो यह कहानी आपके काम की हो सकती है।

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ये घटनाएं गवाह हैं कि बिहार की सत्‍ता में आने के लिए बीजेपी संविधान उल्‍लंघन की किसी भी हद तक जा सकती थी। इसे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार से बेहतर कोई नहीं समझ सकता था। एक बार बीजेपी पहल कर देती, तो लालू-नीतीश उसके जाल में फंस कर तड़पते। हुआ यों कि तेजस्‍वी के इस्‍तीफ़े के बहाने अपनी ओर से पहल कर के बीजेपी की महत्‍वाकांक्षा को फांसने का निर्णय लिया गया, भले ही उससे संवैधानिक मूल्‍यों की क्षति क्‍यों न होती। कहानी बेशक स्क्रिप्‍टेड थी, लेकिन इसकी पटकथा लालू-नीतीश ने लिखी थी। फंसी बीजेपी है। कैसे? आइए समझते हैं।

सबसे पहले यह सोचिए कि इस अध्‍याय से किसे लाभ होने जा रहा है? पहले लालू हैं। घटनाक्रम की प्रतिक्रिया और सहानुभूति के चलते उनका एम-वाइ समीकरण मज़बूत होगा और विपक्ष के नेता के बतौर तेजस्‍वी का प्रोफाइल भी बढ़ेगा। दूसरा लाभ नीतीश कुमार को है क्‍योंकि राजकाज में केंद्र का सहयोग रहेगा और 11000 करोड़ वाला उनका ट्रेज़री घोटाला भी दब जाएगा। बीजेपी को फि़लहाल केवल इतना लाभ है कि उसकी झोली में 18वां राज्‍य कहने को हो गया है। जब सरकार आज से काम करना शुरू करेगी, तो बीजेपी की सत्‍ता में हिस्‍सेदारी का सबसे ज्‍यादा बेज़ा फायदा उससे संबद्ध हिंदूवादी संगठन उठाएंगे। यहीं पर बीजेपी और नीतीश के बीच मामला फंसेगा और नीतीश स्‍कोर करेंगे।

ऐसे में नीतीश की मजबूरी अपनी निजी छवि को बचाने की होगी। अमित शाह की बीजेपी हमेशा की तरह आक्रामक रहेगी। नीतीश अपनी छवि ही बचाएंगे, उससे ज्‍यादा कुछ नहीं क्‍योंकि उन्‍होंने आज जो निवेश किया है वह 2019 के लिए है। वे जानते हैं कि बिहार का उनका कोटा पूरा हो चुका। अगले डेढ़ साल में राज्‍य की (सवर्ण शहरी हिंदू) जनता का परसेप्‍शन बीजेपी के खिलाफ़ हो जाएगा लेकिन नीतीश निजी रूप से और चमकेंगे। ऐसे में बीजेपी का गैर-यादव और गैर-मुस्लिम हिंदू कंसोलिडेशन का एजेंडा अपने आप फंस जाएगा। लोग फिर चाहेंगे कि नीतीश अकेले ही सरकार चलावें, लेकिन ऐसा शायद होगा नहीं क्‍योंकि नीतीश ने बीजेपी को बड़ी लकीर खींचने के लिए एंगेज किया है। बड़ी लकीर का मतलब दिल्‍ली की दावेदारी।

https://www.youtube.com/watch?v=_1iEuZ9Eyhc&t=3s

एक बार फिर नीतीश सही समय पर अंतरात्‍मा की आवाज़ पर बाहर आएंगे। तब तक अगर 18 दलों के लुचपुच विपक्ष के पास कोई अपना खांटी नैरेटिव नहीं पैदा हुआ, तो 2019 में नीतीश के पीछे आना सबकी मजबूरी बन जाएगी। ऐसे में बिहार में बीजेपी अनाथ हो जाएगी और लालू का होमवर्क भी पूरा हो चुका होगा। राबड़ी अब भी उनके पास हैं, मत भूलिए। अगर ऐसा नहीं भी होता है, तब भी नीतीश अकेले दम पर 2020 में बिहार को बचा ले जाने की स्थिति में होंगे क्‍योंकि बीजेपी से उनके अलग होने पर लालू के पीछे एकवट खड़ा मुस्लिम वोट बंटेगा और सवर्ण हिंदू शहरी मतदाता तो नीतीश का ही बना रहेगा। दोनों स्थितियां नीतीश के अनुकूल होंगी।


अब आइए उन चिंताओं पर जो कल से पढ़े-लिखे लोगों द्वारा ज़ाहिर की जा रही हैं। पहली, इसे हिकारत से नीतीश की ”घर वापसी” कहा जा रहा है। क्‍या वास्‍तव में पारंपरिक सेकुलरवाद का डिसकोर्स हमारी चुनावी राजनीति को तय कर रहा है? नहीं। इसीलिए बीजेपी विरोधी सारा विपक्ष ‘सेकुलर’ की नई परिभाषा के अभाव में छटपटा रहा है। नीतीश ने इस छटपटाहट की निस्‍सारता को समझते हुए बाकी दलों की तरह बीजेपी से अलग-थलग पड़ जाना स्‍वीकार नहीं किया, बल्कि उसको अपने तरीके से एंगेज किया है। अपने पाले में खींचा है अपनी शर्त पर। यह रणनीतिक है, भले ही अनैतिक हो। क्‍या नैतिकता आज की चुनावी राजनीति को तय कर रही है? कतई नहीं। इसलिए प्रस्‍तुत अध्‍याय को समझने में सेकुलरवाद और नैतिकता का पारंपरिक मुहावरा काम नहीं आएगा। मतदाता को भी इससे कोई मतलब नहीं है। आप देखिए कि आम शहरी सवर्ण हिंदू जनता में नीतीश-बीजेपी गठजोड़ को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। वह विकास की बात कह रही है।

यहीं पर नीतीश बीजेपी के राजनीतिक मुहावरे को हथिया लेते हैं और मोदी के बगलगीर होकर अपनी निजी प्रोफाइल को बड़ा बनाने की कवायद में पढ़े-लिखे भाजपा-विरोधी लोगों की नफ़रत झेलना भी स्‍वीकार कर लेते हैं। वे जानते हैं कि आज का मतदाता दो चीज़ों पर वोट करता है- (कथित) साफ़-सुथरा सशक्‍त व्‍यक्तित्‍व और विकास। यह मुहावरा मोदी का दिया हुआ है। नीतीश ने बडी चालाकी से उसमें अपनी डंडी मार दी है। केजरीवाल यह काम नहीं कर पाए क्‍योंकि वे सीधे कॉरपोरेट पर सवाल उठा दिए। नीतीश ऐसा कुछ नहीं करेंगे। न वे खुद को सेकुलर कहेंगे और न ही ईमानदार। जब बीजेपी के गौरक्षकों से मामला फंसेगा, तो वे बिहार में बैठकर देश भर के मतदाताओं को संदेश देने का मौका नहीं चूकेंगे। इस तरह मोदी के बरक्‍स वे अपनी प्रोफाइल पीएम मैटेरियल वाली बनाते जाएंगे और संघमुक्‍त भारत के अपने नारे में भी रह-रह कर ग्रीस लगाते रहेंगे। ज़ाहिर है, ऐसा करना उन्‍हें मोदी से अलगाएगा नहीं, बल्कि उनके समानांतर बनाएगा।

https://www.youtube.com/watch?v=gvRx3tCsE28&t=20s

चुनावी राजनीति में नैतिकता, सेकुलरिज्‍म या दलबदल-गठजोड़ की अवसरवादिता आज मायने नहीं रखती है। निजी व्‍यक्तित्‍व और विकास का मुहावरा ही चुनाव जीतने का मंत्र है। यह जनता के लिए भले धोखा है, लेकिन जनता वोट इसी पर देती है। इस लिहाज से नीतीश दरअसल शेर की सवारी कर रहे हैं क्‍योंकि कांग्रेसरूपी हाथी की सवारी अगले सात साल तक कहीं नहीं पहुंचाएगी, इसे वे जानते हैं। या तो वे कहीं पहुंच जाएंगे या फिर खत्‍म हो जाएंगे। फांसी लगाकर मरने से यह विकल्‍प बेहतर है।

अगर ऊपर दी गई बातें आपको कोरी कल्‍पना या कहानी लग रही हों तो यही सही। रामचंद्र गुहा फंतासी बुन सकते हैं तो हम जैसों की क्‍या बिसात। दरअसल, बात उलटी है। पात्र वही रहते हैं, कहानियां बदलती जाती हैं। एक कहानी वो है जो हमें कल से सुनाई जा रही है। एक कहानी मैंने सुनाई है। मेरी कहानी की स्क्रिप्‍ट लालू-नीतीश ने लिखी है। लोकप्रिय कहानी की स्क्रिप्‍ट बीजेपी-नीतीश की लिखी बताई जा रही है। दोनों ही स्क्रिप्‍टों में समान लेखक कौन है? नीतीश कुमार। बस यही एक सूत्र है, बाकी कम्‍यूनल-सेकुलर, नैतिकता, भ्रष्‍टाचार, जाति आदि आधारित व्‍याख्‍याएं अपना-अपना शगल। वैसे, इस बदलाव का मर्म समझना हो तो जनता के बीच जाइए। आपको समझ में आएगा कि जिसे आप अनैतिक समझ रहे हैं, जनता उसे ही बेहतरी का बायस मान रही है। जब जनता को अपने ही दिए जनादेश से विश्‍वासघात का दर्द नहीं, तो कोई क्‍या कर सकता है?

(यह मौजूदा घटनाक्रम की एक वैकल्पिक व्‍याख्‍या है। इसे इसी रूप में लिया जाना चाहिए)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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