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मी लॉर्ड, आप जजों की नियुक्ति में कंपिटिशन से क्यों डरते हैं?

न्यायपालिका जान-पहचान वालों, और स्वजातीय लोगों के गिरोह में तब्दील हो चुकी है। भारत दुनिया का अकेला लोकतंत्र है, जहाँ उच्च न्यायपालिका में जजों का समूह ही जजों की नियुक्ति करता है। अन्य तमाम देशों में जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका की किसी न किसी स्तर पर भूमिका होती है। चुनी हुई सरकार की जजों की नियुक्ति में भूमिका से दरअसल शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति का संतुलन बना रहता है। शासन के किसी एक अंग के बेलगाम होने से रोकने की यह व्यवस्था संविधान में बहुत सोच- समझ कर की गई थी।

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भारत के संविधान निर्माताओं ने इसी को ध्यान में रखते हुए दो प्रावधान संविधान में किए थे। एक, जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका और दूसरा, अखिल भारतीय न्यायिक सेवा अर्थात ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस का प्रावधान। संविधान का अनुच्छेद 312 संसद को यह अधिकार देता है कि वह ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस की व्यवस्था कर सकता है। https://indiankanoon.org/doc/647227/

सरकारों की कमज़ोरी की वजह से, न्यायपालिका ने जजों की नियुक्ति में सरकार भी भूमिका को ख़त्म कर दिया है। एक के बाद एक, तीन जजेज केस के फ़ैसलों के ज़रिए जज ही जजों को नियुक्त करने लगे हैं। इसे ‘कोलिजियम सिस्टम’ कहा जाता है। यह बहुत ही विवादास्पद व्यवस्था है, लेकिन न्यायपालिका इसे छोड़ने को तैयार नहीं है।

इसकी वजह से पूरी न्यायपालिका रिश्तेदारों, जान-पहचान वालों, और स्वजातीय लोगों के गिरोह में तब्दील हो चुकी है। भ्रष्टाचार चरम पर है, और ऐसे अक्षम और नाकारा जज आ रहे हैं, जो मोर के आँसू से मोरनी को गर्भवती बना रहे हैं।

जस्टिस कर्णन का केस न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का ज्वलंत उदाहरण है। इस केस में, न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले हाई कोर्ट के जस्टिस कर्णन को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना का दोषी क़रार देकर जेल में बंद कर दिया।


दूसरी तरफ़, न्यायपालिका अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के रास्ते में भी रोड़े अटका रही है। इस संबंध में जब संसद में सरकार से सवाल पूछा गया, तो यह पता चला कि न्यायपालिका का रुख़ इस मामले में कितना नकारात्मक है। http://164.100.47.190/loksabhaquestions/qhindi/11/AS553.pdf

ज़ाहिर है, न्यायपालिका में सुधार की हर कोशिश का जजों का समूह विरोध कर रहा है। उनके निजी स्वार्थ उन्हें सुधार के रास्ते पर बढ़ने से रोक रहे हैं। ऐसे में आगे चलकर संसद ही न्यायपालिका को बेलगाम होने से रोकने का कोई उपाय कर सकती है, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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