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हिंदी साहित्य में इमरान प्रतापगढ़ी क्यों नहीं हैं?

इमरान प्रतापगढ़ी नाम के एक युवा उर्दू मंचीय शायर ने मुसलमानों को हाथ में काली पट्टी बाँध कर ईद मनाने के लिए कहा। यह एक मुसलमान लड़के की मॉब लिंचिंग की घटना पर प्रतीकात्मक विरोध के लिए था। अपनी इस मुहिम में इमरान एक हद तक सफल भी रहा। समाज से जुड़ने का यह लाभ है, कि समाज तक आप अपनी बात पहुँचा सकते हैं।

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इमरान की इस मुहिम से पता चलता है कि एक शायर की समाज में कुछ उपयोगिता है, वह एक जनसमूह के साथ खड़ा हो सकता है। उसका समाज में कुछ दख़ल और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। यही अभिव्यक्ति का ख़तरा उठाना है। हिंदी में हर कोई अभिव्यक्ति का ख़तरा उठाने की रट लगाए रहता है, लेकिन क्या हिंदी का कोई कवि ऐसा कर सकता था?

ट्रेन में एक बार मुझे एक आईआईटियन मिला। उसने मुझे लिट्रेचर वाला जान कर पूछा, क्या हिंदी में हरिवंश राय बच्चन के बाद कोई कवि नहीं हुआ? मैंने उसका टेस्ट जान कर उत्तर दिया कि, कुमार विश्वास हुए हैं न? उसने यह सुन कर कहा कि, ‘विश्वास को सुन चुका हूँ, लेकिन वह पॉलिटिशियन बन गया है। पहले भी वह चुटकलों के साथ गाना गाता रहता था।’

पढ़ें- मॉब लिंचिंग के खिलाफ इमरान प्रतापगढ़ी की अपील, ईद के दिन काली पट्टी बांधकर नमाज़ पढ़ें मुसलमान

हिंदी कविता के बारे में इस निराशापूर्ण बातचीत के बावज़ूद, उसके मुँह से यह सुन कर अच्छा लगा था, कि उसने तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया पढ़ी थी। साहित्य का समाज से जुड़ना निहायत ज़रूरी है। विशेषकर कविता का। हिंदी कविता की मुख्यधारा में वर्ग-विशेष की बहुलता है। जातीय एकांगिकता भी है। वे कवि अपनी कविता से अपने समाज को ही पूरी तरह से नहीं जोड़ पाते। वृहत समाज को जोड़ना दूर की बात है। वह भारत के बीस प्रतिशत लोगों द्वारा बीस प्रतिशत लोगों के लिए लिखी गयी कविता जान पड़ती है। उन कवियों में भी कोई ब्रेख़्त है, कोई लोर्का है और कोई नाज़िम हिकमत है। कोई सूफ़ी कोई रहस्यवादी है।


क्या हिंदी की मुख्यधारा की कविता एक पतली नाली भर है ? क्या यह पतली नाली समाज से कविता के संबंध ख़त्म करने के लिए ही बनाई गई है? क्या भारत के वृहत्तर समाज के सुख-दुःख से उसका जुड़ाव ख़त्म हो चुका है?

(लेखक सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात में सीनियर रिसर्च फेलो हैं।)

https://www.youtube.com/watch?v=-6kc_IjLddg&t=32s
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