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स्त्री को देवी मानकर पूजते हैं और गाली उसी देवी के अंगों की देते हैं

चू.., मादर…, बहन…, रंडी, वेश्या, भो… के हमारे समाज में इन शब्दों का बहुतायत के साथ प्रयोग होता है। इन्हें सभी धर्म के मानने वाले लोग इस्तेमाल करते हैं। इन सभी गालियों का प्रयोग हमारे समाज में सभी के लिए होता है पर जिसके लिए होता है वह बहुत ही असहज हो जाता है। गालियां देने का प्रचलन दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। आजकल तो छोटे बच्चों के मुंह से भी यह सभी गालियां आराम से सुनी जा सकती हैं। जिसे हम आप तो रोकते हैं अपने बच्चों को कहने से पर लोवर क्लास के लोग इस पर ध्यान भी नहीं देते। नतीजतन यही बच्चे बड़े होकर इन शब्दों के बिना एक वाक्य भी नहीं बोल पाते।

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असल में यह एक प्रकार की मानसिक विकलांगता है क्योंकि वजह कोई भी हो हम गालियों के रूप में स्त्री के यौन अंगों की तरफ ही इशारा करते हैं। स्त्री को परिवार की मान मर्यादा की रक्षिता माना गया है और इसीलिए जब कभी किसी को अपनी उफ़नाती घृणा निकालने की जरुरत पड़ती है तो वह लड़की को उठा लेता है बलात्कार करता है।

चूतिया!

दरअसल चूतिया एक ऐसी गाली है जो सीधे योनि से जुड़ी हुई है। इसका प्रयोग सबसे अधिक होता है क्योंकि लोग इसका अर्थ बेवकूफ़ भी समझते हैं जबकि यह अंग_विशेष की ओर इंगित करती है। देखा जाए तो अब चुतिया एक आम गाली है जो स्त्री की योनि से जुड़ी हुई है। योनि के नाम पर बनी यह गाली व्यक्ति के मूर्ख होने का संकेत देती है। यह एक पितृसत्तामक सूचक शब्द बन गया है इसके बारे में किसी का ध्यान ही नहीं गया। इसी तरह से तीन और गालियां ब*****, म****** और भो**** का भी बहुतायत के साथ प्रयोग किया जाता है।

शिवसेना तो बात-बात पर धर्म का हवाला देती है यदि स्त्री और पुरुष को एक साथ देख ले तो डंडा लेकर पीटने लगती है। देवी मानकर पूजते तो हैं पर एक भी वाक्य बिना बगैर गालियों के पूरा नहीं करते हैं तब इन्हें शर्म महसूस नहीं होती? समाज कहता है तुम सीता बनो, तुम मीरा बनो, तुम राधा बनो पर तुम दरअसल बना क्या रहे हो हमें! औरत का शरीर तुमको इतना लुभाता है कि तुम्हारा सारा पुरुषार्थ एक ही जगह पर जाकर केंद्रित हो जाता है। फिर उससे आगे ना तुम कुछ सोच पाते हो ना तुम कुछ कर पाते हो। क्या कभी गाली देने वालों के दिमाग में यह आया होगा कि जब यह शब्द हम स्त्रियां सुनती हैं तो कैसा महसूस करती होंगी? कितना विद्रोह पनपता होगा और कितनी शर्म महसूस होती होगी? यह गालियां किसी मानसून की बौछार की तरह से पूरे देश को भीगाती रहती हैं। इन गालियों से शायद ही देश का कोई हिस्सा अछूता हो। सबकी अपनी अपनी गाली है अपनी अपनी भाषा में


कहते हैं, “यत्र पूज्यते नारी, तत्र रमंते देवता”

क्या यह है तुम्हारी पूजा जहां पर तुम्हारे देवता वास करते हैं? यह देह सूचक गालियां तुम्हारे भीतर की नीचता को दर्शाती हैं। तुम्हारे पोथी, ग्रंथ देह मुक्ति की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे और इन्हें मानने वाले जबरन अपनी भाषा में इसी देह को जोड़ें रहेंगे।

रंडी
सबसे अधिक प्रचलित गाली है वेश्या के लिए हमारे समाज में। रंडी शब्द का प्रयोग करते वक्त लोग भूल जाते हैं कि समाज ने जबरन या तो अगवा की हुई या फिर धोखा खाई हुई होती हैं। जिन्हें समाज बेहद निम्न दर्जे की मानते हुए कुल्टा और नीच मानता है। यह वेश्याएं, जो समाज से पूरी तरह से बहिष्कृत हैं को समाज के ठेकेदार पुरुषों ने ही पैसे और देह के लिए इस दलदल में धकेला है, लोग भूल जाते हैं… यह वेश्याएं समाज की इसी यौन सुचिता की मानसिकता के कारण हमेशा के लिए समाज से बहिष्कृत हो जाती है क्योंकि स्त्री की पवित्रता को सीधे सीधे उसके कौमार्य से जोड़ दिया जाता है। वेश्या और रंडी शब्द अक्सर किसी स्त्री के लिए ही इस्तेमाल होते हैं। जबकि म******, ब*****और भो***के किसी पुरुष के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

सीधा अर्थ यह निकलता है कि समाज में यदि किसी को नीचा दिखाना हो या अपमानित करना हो तो यह सभी गालियां बेधड़क दी जा सकती हैं। सड़क, चौराहे, बाज़ार या किसी भी सामूहिक जगहों पर यदि स्त्री को अपमानित करना हो तो रंडी और वेश्या शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यदि पूरुष द्वारा पुरुष को अपमानित करना हो तो भी ब**** और मा**** शब्दों का ही प्रयोग होता है।

ये भी हैरानी की बात है कि इन गालियों को निकालते वक्त वे शर्मिंदगी नहीं वरन दबंग पुरुषत्व का अहसास करते हैं। यहां मैं रांड और रंडी का फर्क बताती चलूं। जिसका पति मर चुका हो उसे रांड कहा जाता है और क्योंकि वेश्याओं के पति होते ही नहीं हैं तो उन्हें रंडी कहा जाने लगा। जो धीरे धीरे गाली का पर्याय बन गया… यहां ये भुला दिया गया कि औरत वेश्या बनी तो उसका उपभोग पुरुष द्वारा ही किया गया। वेश्या को अगर पुरुष न मिले तो वो खंभे के साथ वेश्यावृति नहीं करेगी। फिर गाली वाला हिस्सा सिर्फ उसी के हिस्से में क्यूं आता है?

आज समाज में ये सभी गालियां इतने गहरे पैठ बना चुकी हैं कि स्त्री भी स्वीकार कर चुकी है और कभी कभी तो वो स्वयं भी वेश्या और रंडी शब्द का इस्तेमाल करती है बिना यह सोचे समझे कि घूम फिर के ये गाली वह स्वयं को दे रही है। यह एक ऐसी शब्दावली है जो पढ़ा लिखा…ऊंचे ओहदे पर विराजमान पुरुष भी देने से नहीं हिचकिचाता। गरीब, मजदूर, रिक्शा चालक, फुटपाथ पर दुकान लगाने वाला..आदि के दिन की शुरुआत और दिन की समाप्ति गाली से ही होती है… बिना इस बात का विचार किए कि ये गालियां वे अपनी ही बहन, बेटी, मां, पत्नी को दे रहे हैं।

(नोट: अबकी बार जब गाली दे तो मेरी बातों को ध्यान में रखे)

– ये लेखिका के निजी विचार हैं। 

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