fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
अन्य

हिमाचल प्रदेश: सवर्णों ने रोका दलित महिला का अंतिम संस्कार, नाले किनारे किया गया अंतिम संस्कार

highers-caste-people-prevented-Dalit-woman's-funeral,-body-had-to-cremated-by-the-side-of-drain
(Image Credits: The Indian Express)

बीते शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के धारा गांव में अंतिम संस्कार के लिए एक सार्वजनिक श्मशान घाट तक दलित परिवार को जाने से रोक दिया गया सवर्ण समाज ने श्मशानघाट पर दलित महिला का अंतिम संस्कार करने से रोक दिया हालाँकि अभी तक पुलिस ने इसकी शिकायत दर्ज नहीं की गई है।

Advertisement

यह घटना मनाली-कुल्लू में चर्चा का विषय बन गई है। जानकारी के अनुसार फोजल के धारा गांव में एक दलित महिला को जब परिजन उसका अंतिम संस्कार करने के लिए श्मशानघाट लेकर गए तो सवर्ण समाज के लोगों ने उन्हें अंतिम संस्कार करने से रोका और छुआछूत का हवाला दिया। सवर्णों के विरोध के बाद दलित समाज के लोगों को महिला के शव को नाले में जलाना पड़ा।

शव को सार्वजनिक शमशानघाट पर जलाने से रोकने की शिकायत पर प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने रविवार को संज्ञान लिया. राज्यपाल ने कुल्लू प्रशासन से कहा कि इस मामले में उचित कार्रवाई करें. श्री रविदास धर्म सभा के अध्यक्ष करम चंद भैटिया के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की और घटना से उन्हें अवगत कराया. इसके बाद राज्यपाल ने उचित कार्रवाई का आदेश दिया.

धारा गांव के ग्रामीण संगत राम ने बताया कि उनकी दादी गरलू देवी का निधन हो गया। जब वह लोग बुजुर्ग महिला को अंतिम संस्कार के लिए श्मशानघाट ले गए तो सवर्ण जाति के लोगों ने शव जलाने नहीं दिया। ग्रामीणों ने तर्क दिया कि देवता नाराज हो गया तो गांव वालों को नुक्सान हो सकता है, जिसका हर्जाना आपको भरना पड़ेगा। सवर्ण जाति के लोगों द्वारा विरोध करने के बाद उन्होंने शव को नदी किनारे जो मुख्य रूप से एक नाला बन चुकी है मजबूरन दलित परिवार को वही शव को जलाना पड़ा।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रदेश में यह कोई नई बात नहीं है. शताब्दियों से आ रही जाति आधारित व्यवस्था के तहत दलित और पिछड़े समुदाय के लोगों को सार्वजनिक स्थलों, मंदिरों, जल स्थलों पर जाने से रोका जाता रहा है. स्कूल की गतिविधियों में भी निचली जाति के छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है. यहां तक कि मिड डे मील में भी भेदभाव बरता जाता है, क्योंकि 15 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में रसोइये आमतौर पर उच्च जाति के हैं. राज्य के लिए यह दुखद है कि 82.8 फीसदी साक्षरता दर होने के बाद भी यह भेदभाव जारी है.


Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved