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जानिए बीजेपी द्वारा बैंक विलय के फैसले से क्यों नाराज है लोग ?

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(image credits: news18.com)

बीजेपी सरकार का एक और बड़ा फैसला लोगो को डरा रहा है। जहाँ बीजेपी सरकार के सभी फार्मूले फेल हो रहे है वहीँ बीजेपी सरकार का बैंक विलय वाले फैसले से लोग खासा नाराज भी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थवयवस्था को मजबूत करने के लिए कोई बड़े कदम नहीं उठाये है। वही आय दिन देश की बड़ी कम्पनियाँ बंद होती जा रही है। ऐसे में देश एक अन्धकार की तरफ बढ़ रहा है।

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अगर बैंको की बात करे तो सभी छोटे बड़े सरकारी बैंको को एक साथ मिलाया जाएगा। पंजाब नैशनल बैंक का ही उदाहरण लीजिए जिसमें ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक को मर्ज करने का फ़ैसला लिया गया है। विलय के बाद पीएनबी एसबीआई के बाद दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक हो जाएगा।

परन्तु इस विलय पर आपत्ति भी जताई जा रही है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस प्रस्तावित विलय का ख़तरा यह है कि मज़बूत बैंकों के सहारे कमज़ोर बैंकों को उठाने की जगह कहीं ऐसा न हो जाए कि कमज़ोर बैंक ही मज़बूत बैंकों को डुबो दें।

इससे पहले हुए सरकारी बैंकों के विलय पर नज़र डालें तो बहुत भरोसा नहीं पैदा होता। अप्रैल 2017 में देश के सबसे बड़े बैंक ‘स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया’ में इसके पांच संबद्ध बैंकों को मर्ज कर दिया गया था. उस समय काफ़ी उत्साह भरा माहौल था और सभी के शेयरों में उछाल देखने को मिला था।

मगर यह अच्छा दौर कुछ समय के लिए ही रह पाया था। मर्ज किए गए बैंकों के नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट्स विलय से पहले जहां 1.01 लाख करोड़ रुपये (6.94%) थे, जल्द ही वे 1.88 लाख करोड़ रुपये (9.97%) पर पहुंच गए।


अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं कि अधिकतर मर्जर नाकाम साबित होते हैं। हार्वर्ड बिज़नस रिव्यू के एक लेख का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं, “कई शोधों से विलय और अधिग्रहणों की विफलता की दर पता चलती है जो कि 70 से 90 फ़ीसदी के बीच है।

1993 में पंजाब नैशनल बैंक और न्यू बैंक ऑफ़ इंडिया के विलय का एक बड़ा मामला है। आरबीआई ने सेक्शन 45 के तहत यह मिलाप करवाया था क्योंकि न्यू बैंक ऑफ़ इंडिया में लिक्विडिटी की स्थिति बेहद अस्थिर हो गई थी।

सरल शब्दों में इसका मतलब यह है कि बैंक के पास अपने जमाकर्ताओं को लौटाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। इस मर्जर का पीएनबी पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा. लगातार लाभ कमाने का रिकॉर्ड होने के बावजूद उसे 1996 में 96 करोड़ रुपये की हानि हो गई। यह मर्जर कई मामलों में बेहद पेचीदा रहा। न्यू बैंक ऑफ़ इंडिया के उन कर्मचारियों ने मुक़दमे कर दिए जिन्हें लगा कि उन्हें बाहर निकाला जा रहा है।”

शायद यही वजह के लोग सरकार के इस फैसले पर नाराज है। आखिर सरकार पर भरोसा भी कैसे किया जाए जब उनके सभी उपाय विफल साबित हो रहे है।  एक तरफ देश डूब रहा है तो दूसरी और बीजेपी देश में तरक्की की बात कर रही है 

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