fbpx
ट्रेंडिंग  
ट्रेंडिंग  
अन्य

एससी एसटी कानून की धारा 3(2)(1) को रद करने के लिए दायर की गई याचिका

Petition-filed-for-the-cancellation-of-section-3-(2)-(1)-of-SC-ST-Law
(Image Credits: Hindustan Times)

समाज में कुछ लोगो के कहने पर और सरकार द्वारा एससी एसटी एक्ट कानून में छेड़छाड़ करने की कोशिश की जा चुकी है। कभी सरकार द्वारा राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए इसमें बदलाव करने की कोशिश की जाती है। तो कभी आम नागरिको द्वारा इस क़ानून में बदलाव करने के लिए याचिका दाखिल की जाती है। इसी प्रकार एक बार इस कानून में बदलाव करने को लेकर वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा यचिका दायर की गई है।

Advertisement

दरअसल वकील ऋषि मल्होत्रा ने याचिका दाखिल कर सजा देने में अदालत का विवेकाधिकार न होने को असंवैधानिक बताते हुए एससी एसटी कानून की धारा 3(2)(1) रद करने की मांग की है। इस धारा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति जो एससी एसटी वर्ग का नहीं है, किसी एससी एसटी वर्ग के खिलाफ जानबूझ कर झूठे साक्ष्य देता है। और उसके कारण उस व्यक्ति को फांसी हो जाती है तो झूठे साक्ष्य देने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाएगा।

याचिकर्ता ने इस बारे में कहा की, सजा के मुद्दे पर अदालत को परिस्थितियों के मुताबिक फैसला लेने का विवेकाधिकार न देना असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर 12 अप्रैल को सुनवाई कर सकता है। वकील ऋषि मल्होत्रा की याचिका में आइपीसी की धारा 194 से तुलना की गई है, जिसमें ठीक वैसे ही अपराध के लिए अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है। बल्कि उसमे तो अदालत को मृत्युदंड और कैद में चुनाव करने का विवेकाधिकार दिया गया है।

इन दोनों कानूनों में सिर्फ अंतर इतना है कि एससी एसटी कानून में झूठे साक्ष्य देने वाला सामान्य वर्ग का है। और जिसके खिलाफ साक्ष्य दिये गए हैं वह एससी एसटी वर्ग का होता है। जबकि आइपीसी में दोनों व्यक्ति सामान्य वर्ग के होते हैं।

वकील ऋषि मल्होत्रा की इस याचिका में अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले अन्य कानूनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त कर दिये जाने या सरकार द्वारा संशोधित किये जाने का उदाहरण देते हुए इस कानून को रद करने की मांग की गई है।


याचिकाकर्ता ने याचिका में अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान करने वाली आइपीसी की धारा 303 का उदाहरण दिया है। जिसमें कहा गया था कि अगर कोई व्यक्ति हत्या के जुर्म में उम्रकैद काट रहा हो और उस दौरान वह फिर वही अपराध करता है तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 1983 के मिट्ठू बनाम पंजाब राज्य के मामले में धारा 303 को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर विधायिका सजा देने की प्रक्रिया में अदालत का परिस्थितियों के मुताबिक फांसी की सजा न देने का विवेकाधिकार खत्म करती है। और कोर्ट को बाध्य करती है की वह परिस्थितियों को अनदेखा करके सिर्फ मृत्युदंड दे, तो इस प्रकार कानून असंवैधानिक है।

बताया जा रहा है की इसी तरह कोर्ट ने अनिवार्य रूप से मृत्युदंड देने वाले शस्त्र अधिनियम की धारा 27(3) को 2012 में पंजाब राज्य बनाम दलबीर सिंह के मामले में असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया था। इस धारा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति प्रतिबंधित हथियार रखता है और उससे किसी की जान ले लेता है तो उसे मृत्युदण्ड होगा। कोर्ट ने इसे रद करते हुए कहा था कि यह संविधान की मूल भावना और कोर्ट द्वारा विकसित की गई व्यवस्था के खिलाफ है।

इसी तरह याचिका में कहा गया है कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 31ए में सरकार ने 2014 में संशोधन करके अनिवार्य रूप से मृत्युदंड देने का प्रावधान खत्म किया था और मृत्युदंड को वैकल्पिक बनाया था। वकील ऋषि मल्होत्रा का कहना है की अनिवार्य मृत्युदंड के प्रावधान को बनाए रखने से सीआरपीसी की धारा 235(2) और 354(3) का उल्लंघन होता है। जो कहती हैं कि सजा से पहले सजा के मुद्दे पर सुनवाई होगी तथा अदालत सजा देने के कारण दर्ज करेगी।

आइये हम आपको एक बार फिर एससी एसटी कानून की धारा 3(2)(1) जिसे रद्द करने के लिए याचिका दायर की गई है। उसके बारे में बताने की कोशिश करते हैं। दरअसल एससी एसटी कानून की धारा 3(2)(1) कहती है कि जो व्यक्ति एससी या एसटी वर्ग का सदस्य नहीं है, वह व्यक्ति अगर किसी एससी एसटी वर्ग के सदस्य के खिलाफ जानबूझकर उस अपराध में झूठा साक्ष्य देता है। जिसमें मृत्युदंड की सजा हो सकती हो। और उस झूठे सबूतों के आधार पर किसी को मृत्युदंड की सजा हो जाती है तो झूठे साक्ष्य देने वाले व्यक्ति के लिए भी मृत्युदण्ड का प्रावधान है।

वहीं दुसरी तरफ आईपीसी की धारा 194 भी ठीक ऐसे ही अपराध और सजा की बात करती है। परन्तु उसमें अपराध एससी एसटी के खिलाफ नहीं होता, इस कानून में अनिवार्य रूप से मृत्युदंड देने का प्रावधान नहीं है। बल्कि इस धारा में कोर्ट को फांसी या कैद की सजा तय करने का विवेकाधिकार दिया गया है।

आखिर सरकार और कुछ लोग एससी एसटी कानून में बदलाव करने के लिए इस प्रकार का रुख क्यों रखते है। कानून तो और भी जिसमे बदलाव किया जा सकता है। आखिर कुछ लोगो को इस काननू से क्या परेशानी है, हाँ अगर कुछ लोगो को धारा के अनुसार मिलने वाले सजा से चिंता है। तो उन लोगो को यह जान लेना चाहिए, की किस प्रकार समाज में एक जाति द्वारा दूसरी खास जाति के लोगो के साथ अभी भी किस हद तक अन्याय किया जाता है।

खैर यह तो सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर करता है की वह 12 अप्रैल को याचिकाकर्ता वकील मल्होत्रा की याचिका पर क्या सुनवाई करेगा।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top

© copyright reserved National Dastak. All right reserved