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आखिर क्यों बताती थीं सावित्रीबाई फुले पेशवा राज को खराब?

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(Image Credits: Feminism In India)

हममें से ज्यादातर लोग सावित्रीबाई फुले को आधुनिक भारत की पहली शिक्षिका के रूप में जानते हैं। परन्तु बहुत कम ही लोगों को ये पता होगा कि सावित्री बाई फुले अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी शिक्षा की बहुत बड़ी हिमायती थीं।

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इस बात को जानकर हममें से बहुत लोगो को आश्चर्य हो सकता है। आखिर जिस अंग्रेजी शासन को भारतीय जनमानस का एक बड़ा हिस्सा शोषक मानता है, वह हमारी पहली महिला शिक्षिका के लिए मुक्तिदाता कैसे हो सकता है?

इसमें कोई शक नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों ने भारत पर 150 सालों तक जनता का शोषण किया। लेकिन ये भी तथ्य है कि अंग्रेजों के शासन के बाद ही भारत में दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को शिक्षा का अवसर मिला।

पेशवा राज में दलितों और स्त्रियों को बुनियादी अधिकार तक प्राप्त नहीं थे। इस कारण सावित्रीबाई फुले अंग्रेजी शासन का समर्थन करती थीं और पेशवा राज को खराब बताती थीं।

महज 17 वर्ष की आयु में बनी प्रिंसिपल


सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का बाल विवाह हुआ था। ज्योतिबा के सहयोग से सावित्रीबाई ने पाश्चात्य शिक्षा हासिल करी और केवल 17 साल की आयु में ही ज्योतिबा द्वारा खोले गए लड़कियों के विद्यालय में शिक्षिका और प्रिंसिपल बनीं।

सावित्रीबाई के लेखन से साफ है कि वे अंग्रेजी शिक्षा को महिलाओं और शूद्रों की मुक्ति के लिए जरूरी मानती थीं। अपनी कविता ‘अंग्रेजी मैय्या’ में वो लिखती है:

अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली पूरे स्नेह से.
अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई और नहीं बची है अब पेशवाई, मूर्खशाही.
अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान शूद्रों को देती है जीवन वह तो प्रेम से.
अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध पालती पोसती है माँ की ममता से.
अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली जंजीर पशुता की और दी है मानवता की भेंट सारे शूद्र लोक को.

छत्रपजि शिवाजी की प्रशंसा करने वाली सवित्रीबाई पेशवाओं के शासन की घोर विरोधी थीं। इसकी मुख्य वजह थी कि पेशवाओं के राज में शूद्रों और महिलाओं को बुनियादी अधिकार नहीं दिया जाना। सवित्रीबाई शुद्रों की दयनीय स्थिति का वर्णन अपनी एक कविता में करते हुए लिखती हैं:

पेशवा ने पांव पसारे उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर शूद्र हो गए भयभीत थूक करे जमा गले में बँधे मटके में और रास्तों पर चलने की पाबंदी चले धूल भरी पगडंडी पर, कमर पर बंधे झाड़ू से मिटाते पैरों के निशान

असल में सावित्रीबाई ने सदियों से ब्राह्मणवाद और जातिवाद के कारण ‘गुलामगिरी’ में पड़ें शूद्रों और महिलाओं की आजादी के लिए अंग्रेजी शासन और शिक्षा को एक अवसर के रूप में देखा।

महारों की वीरता पर लिखीं कविताएं

आज जिस 1857 के ‘सिपाही विद्रोह’ को खासकर उत्तर भारत में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा जाता हैं। उसी समय सावित्रीबाई फुले ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले महारों की वीरता की तारीफ़ में कविताएं लिखी। वे मानती थीं की अंग्रेजों ने हमें नहीं बल्कि उन ब्राह्मणो को अपना गुलाम बनाया है, जिन्होनें सदियों से शूद्रों को गुलाम बनाया हुआ है।

कोरेगांव में जिस जीत के जश्न को मनाने को लेकर दलितों पर हमले हुए, उस जीत के ऊपर भी सावित्रीबाई फुले ने महारों की वीरता को सराहा था। वो एक जनवरी, 1818 को पेशवा की सेना पर जीत को अंग्रेजों से अधिक महारों की जीत के रूप में देखती थीं।

भीमराव अंबेडकर ने दलितों के लिए ‘शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो’ का जो नारा दिया था, उस नारे की पृष्टभूमि सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं से बहुत पहले तैयार कर लिया था। इसी कारण आम्बेडकर भी फुले दम्पति को अपना आदर्श मानते थे।

सावित्रीबाई फुले ने शूद्रों को शिक्षित होने और मेहनत करने का आह्वान करते हुए लिखा

स्वाबलंबन का हो उद्यम, प्रवृत्ति ज्ञान-धन का संचय करो मेहनत करके
बिना विद्या जीवन व्यर्थ पशु जैसा निठल्ले ना बैठे रहो करो विद्या ग्रहण
शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए मिला है कीमती अवसर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का

जिस अंग्रेजी शासन को ज़्यादातर जनसमुदाय उपेक्षा की नजर से देखता है। उस समुदाय की तारीफ़ करने की सावित्रीबाई फुले के पास अपनी जमीनी वजह थी। इस जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि शूद्रों और महिलाओं के भीतर शिक्षा का जो प्रसार हुआ है उसमें ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले का नाम सबसे प्रथम स्थान पर होगा।

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