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अमित शाह ने चुनाव के लिए मांगा आरएसएस से उनका समर्थन

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(Image Credits: DNA India)

लोकसभा चुनाव में केवल एक महीना ही बाकी रह गया है। सभी पार्टियों ने अपने स्तर पर इसको लेकर तैयारियाँ कर ली है। कुछ पार्टियों ने अकेले ही चुनाव लड़ने का सोचा है। वहीं कुछ पार्टियों ने आपस में गठबंधन करके चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीख की भी घोषणा कर दी है और इसके साथ आयोग ने सात चरण में 11 अप्रैल से 19 मई के बीच चुनाव कराने की बात कही है। सातों चरण के मतदान के बाद 23 मई को मतगणना की जाएगी।

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मुख्य चुनाव आयोग आयुक्त सुनील अरोड़ा ने इस बात की घोषणा रविवार को की। सुनील अरोड़ा के इस बात की घोषणा होने के कुछ ही घंटे पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव में आरएसएस से उनका समर्थन मांगा था। अब ध्यान देने वाली बात यह की, अपने आप को इतना बड़ा बताने वाली पार्टी, आखिर आरएसएस से मदद मांगने के लिए क्यों मजबूर हो गई। इससे तो यही शाबित होता है की अब बीजेपी में अपने बलबूते चुनाव लड़ने की क्षमता नहीं रही है, अब पार्टी ने अपना आत्मविश्वास खो दिया है।

दरअसल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ग्वालियर के केदारधाम में सरस्वती शिशु मंदिर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की तीन दिवसीय बैठक के लिए इकट्ठा हुए आरएसएस और इसके विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों से मुलाकात की। सूत्रों के अनुसार अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में शामिल हुए बीजेपी अध्यक्ष और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बीच देर रात तक एकांत में चर्चा हुई। जिसमे लोकसभा चुनाव के साथ साथ पार्टी के नीतियां और संघ के रूख के बारे में बातें की गई।

जब आरएसएस संगठनों के पदाधिकारियों से अमित शाह के बारे में पुछा गया की, क्या उन्होंने चुनाव के लिए संघ का समर्थन मांगा है। तब इसका जवाब देते हुए आरएसएस सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने मीडियाकर्मियों से कहा कि, एक राजनीतिक दल के नेता के रूप में यह शाह का काम है कि वे सभी से समर्थन मांगें। जोशी ने कहा, “उन्होंने हमसे भी समर्थन मांगा है।” इसके साथ भैयाजी जोशी ने बैठक में राम मंदिर और कोर्ट के फैसले को लेकर भी प्रेसवार्ता में बयान दिया।

न्यायालय पर टिपप्प्णी करते हुए भैयाजी जोशी ने कहा की जिस दिन न्यायालय ने कहा था की, राम मंदिर उनकी प्राथमिकता में नहीं है, यह वक्तव्य हिन्दू समाज की भावनाओ का अपमान करने वाला था। उन्होंने कहा राम मंदिर हमारी अस्मिता का प्रतीक है, यह हमारी आस्था से जुड़ा है। और हम न्यायालय से अपेक्षा रखते है की इस सम्बन्ध में शीघ्र ही फैसला सुनाये। इसके साथ उन्होंने कहा सवैधानिक संस्थानो को सामजिक परम्पराओं का सम्मान चाहिए। सविधान का विषय में उन्होंने कहा, संविधान महत्वपूर्ण है परन्तु समाज जीवन में सविधान नहीं चल सकता है।


वैसे तो मौजूदा सरकार देश के संविधान को लोकतंत्र के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण मानती है। परन्तु दूसरी और उनसे ही जुड़े कुछ लोगो द्वारा सविधान को लेकर इस प्रकार की बयानबाजी की जाती है, जो की उचित नहीं है।

बैठक में एक अन्य आरएसएस पदाधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया की शाह ने बैठक में पिछले एक साल में देश भर में पार्टी के संगठनात्मक विस्तार के बारे में बात की। इसके साथ यह भी कहा जा रहा है की पिछले वर्ष मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार पर उन्होंने कोई चर्चा नहीं की।

पिछले साल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद चुनाव जितने के लिए बीजेपी कोई भी फैसला या किसी भी तरह की मदद लेने से पीछे नहीं हटना चाहती है। लेकिन मौजूदा सरकार को यह पता होना चाहिए की चुनाव जितने के लिए लोगो का भरोसा जीतना सबसे अहम होता है। उसके बाद बाकि की चीजें मायने रखते है। बीजेपी सरकार ने सत्ता में आने से पहले जो भी वादे किये थे वो, उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान पूर्ण रूप से पूरा करने में नाकाम रही है। जिसके कारण पार्टी के ऊपर से जनता का भरोसा उठ चूका है।

बता दें की मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा ने रविवार को कहा कि चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही देश में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। और यह सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। आचारसहिता लागू होने के बाद सरकार न तो कोई नीतिगत निर्णय ले सकती है और न किसी नई परियोजना की घोषणा कर सकती है।

भाजपा सरकार द्वारा आरएसएस से चुनाव के लिए समर्थन मांगने से यह पता चलता है की, बीजेपी चुनाव से पूर्व कोई बड़ा कदम उठा सकती है। सरकार इस चुनाव में जनता का समर्थन पाने के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। अब देखना यह होगा की वो कौन से ऐसे कदम होंगे जिससे मौजूदा सरकार पांच साल में किये गए वादों से जनता का ध्यान हटाकर लोगो का समर्थन पाने में सफल होगी।

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