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दलित बाहूल्य बुंदेलखंड में भाजपा और गंठबंधन के बीच होगी सीधी जंग

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(Image Credits: News Click)

दलित बाहूल्य बुंदेलखंड जहाँ पहले कभी कांग्रेस का बोलबाला हुआ करता था वही अब बुंदेलखंड में बसपा व सपा का बोलबाला है। देखा जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव ने काफी हद तक राजनीति को पलट कर रख दिया था और कमल खिलाया था, वर्तमान में यहां की चार लोकसभा और 19 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है।

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2019 में सत्ताधारी दल को टक्कर देने के लिए सपा-बसपा ने गठबंधन कर एक बार फिर मैदान में पूरी तैयारी के साथ उतरने का मन बना लिया है जानकारों का मानना है कि यहां भाजपा बनाम गटबंधन के बीच सीधा मुकाबला होगा।

देश की राजनीति के अखाड़े का प्रमुख केंद्र रहा बुंदेलखंड अब एक बार फिर सियासी दलों की गतिविधियों का केंद्र बनता नजर आ रहा है। बुंदेलखंड के कुल मतदाताओं में दलितों की भागीदारी लगभग 30 प्रतिशत है। ऐसे में एक ओर जहां भाजपा के सामने अपनी मौजूदा सीटों को बचाये रखना चुनौती है तो दूसरी ओर बुंदेलखंड में कभी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाली बसपा और सपा अपने बिखरे वोटबैंक को समेटकर फिर से अपने सियासी मिशन को सफलता की ओर ले जाने की कवायद में है।

गठबंधन के बाद झांसी और बांदा सीट तो हमीरपुर व जलौन बसपा के खाते में गई है। सपा बसपा गठबंधन अब और मजबूत हो गया है जिसके कारन बुंदेलखंड में भाजपा की मुसीबत अब और बढ़ती नज़र आ रही है

ठबंधन के बाद झांसी और बांदा सीट तो हमीरपुर व जलौन बसपा के खाते में गई है। सपा बसपा गठबंधन अब और मजबूत हो गया है जिसके कारन बुंदेलखंड में भाजपा की मुसीबत अब और बढ़ती नज़र आ रही है


बुंदेलखंड कभी बसपा का सियासी गढ़ रहा है। बादशाह सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, दद्दू प्रसाद जैसे कद्दावर नेता बसपा सरकार में मंत्री रहे और बुंदेलखंड की सियासी हैसियत के प्रतीक बने रहे। वहीं पूर्व विधानसभा प्रतिपक्ष के नेता गयाचरण दिनकर कहते हैं कि हमारी पार्टी युवाओं को जोड़ने के लिए उनके बीच जा रही है।

लोग अभी भी बहुजन समाज पार्टी के शासन काल में चलाये गए जन कल्याणकारी योजनाओं को याद करते हैं और मायातवी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान प्रदेश की कानून-व्यवस्था की बेहतर स्थिति को याद करते हैं। उनके अनुसार प्रदेश में भाजपा सरकार के दौरान स्थिति पहले से ख़राब हो गई है। लोग अभी भी बहनजी के शासानकाल को याद करते है।

बुंदेलखंड में कई सालों तक पत्रकारिता कर चुके हरी मिश्रा बताते हैं कि बुंदेलखंड की 19 में से 7 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां दलित और आदिवासी वोटर निर्णायक संख्या में हैं। सियासी दलों ने दलितों की समस्याओं को अपना चुनावी एजेंडा बनाया, पर जमीन पर हालात नहीं बदले। हरि मिश्रा कहते हैं एयर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भाजपा के पक्ष में कुछ हद तक फिर महौल बना है।

भाजपा सरकार ने पकिस्तान का मुद्दा उठा कर देश में फिर से सांप्रदायिक माहौल तैयार कर अपने पानी में वोट करने की कोशिश की है, भाजपा सरकार चुनाव से ठीक पहले ही हिन्दू मुस्लिम और साम्प्रदयिक माहौल तैयार करने में कही न कही सफल होती दिखाई दी है पर ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण यह हो जाता है की बहुजन समाज और मुस्लिम समुदाय एकता दिखाए, हलांकि सपा-बसपा के बीच गठबंधन होने के बाद दलित-मुस्लिम वोटर्स नहीं बिखरा तो भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है।

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