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मोदी लहर के बावजूद नवीन पटनायक ने दिया बीजेपी को मात

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(Image Credits: OrissaPOST)

भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल किया है। मोदी लहर के कारण बीजेपी के लगभग सभी उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे। लेकिन एक तरफ जहाँ बीजेपी को इस चुनाव में लगभग सभी राज्यों में जीत मिली है, वही दूसरी और कुछ ऐसे राज्य है जहां बीजेपी में मोदी की लहर भी कुछ खास करने में नाकमयाब रही। हम बात करने जा रहे है ओडिशा से (बीजद) बीजू जनता दल की। इस बार ओडिशा में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल ने शानदार जीत हासिल किया।

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बता दे की ओडिशा की मुख़्यमंत्री नवीन पटनायक राजनीति में इतिहास बनाने को तैयार हैं। नवीन ओडिशा के पहले ऐसे राजनेता हैं जो पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। ओडिशा के इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है जब कोई राजनेता पांचवी बार मुख्यमंत्री बनेगा। यह पहली बार भी हो रहा है जब किसी पार्टी ने लगातार पांचवी बार जीत हासिल की है।

इस लोकसभा चुनाव के साथ साथ राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल को 112 सीट मिली हैं। सरकार बनाने के लिए पार्टी को सिर्फ 74 सीटें ही चाहिए थी। देखा जाये तो इस बार नवीन पटनायक के लिए जीतना उतना आसान नहीं था। एक तरफ नवीन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चल रही थी तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी नवीन के लिए रास्ते का रूकावट बनी हुई थी।

2 साल पहले 2017 में हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया था। नविन पटनायक ने अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए कई सोशल स्कीम लेकर आई। जैसे किसानों के लिए कालिया और महिलाओं के लिए बीजू स्वास्थ्य योजना पार्टी द्वारा लाया गया। इन योजना के तहत नविन पटनायक गरीबो को 1 रुपए में 15 किलो चावल देते थे, जिससे कारण राज्य में पटनायक सरकार पर गरीबों ने भरोसा दिखाया।

चलिए अब हम आपको ओडिशा में इतिहास बनाने वाले नवीन पटनायक के राजनैतिक सफर के बारे में बताते है। राजनीतिक से मतलब नहीं रखने वाले नवीन पटनायक राजनीति में इतना आगे तक सफर कर लेंगे शायद ही किसी ने सोचा होगा। सन 1997 में जब नवीन पटनायक ने अपने पिता बीजू पटनायक को खो दिया तब नवीन पटनायक का राजनीति में कोई अनुभव नहीं था। सन 1997 में नवीन पटनायक आस्का लोकसभा क्षेत्र से उप चनाव लड़े और जीत हासिल की। और उसी साल उन्होंने बीजू जनता दल का गठन किया।


इसके बाद वर्ष 2000 में बीजू जनता दल ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया। जिसके बाद 147 सीटों में से बीजू जनता दल ने 68 सीटें जीती और नवीन पटनायक ओडिशा के मुख़्यमंत्री बने। 2004 में भी बीजद और भाजपा के बीच लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन किया गया ,इस बार फिर उन्हें बहुमत मिला और नवीन पटनायक मुख़्यमंत्री बने। इस चुनाव में बीजद को 61 विधानसभा सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी के खाते में सिर्फ 32 सीटें आई। अगर हम लोकसभा सीटों की बात करें तो 21 में से 11 सीटों पर बीजद ने कब्जा जमाया, जबकि सात सीटें बीजेपी के हिस्से में गई।

हलाकि वर्ष 2009 के चुनाव में ये गठबंधन नहीं बन सका। दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, इस चुनाव में भी बीजद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 147 में से 103 सीटें प्राप्त की। दसूरी ओर बीजेपी सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई। वहीं लोकसभा में बीजद को 14 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी कोई भी सीट नहीं हासिल कर पाई। इसके बाद 2014 लोकसभा और राज्य के चुनाव में भी बीजद ने शानदार प्रदर्शन किया। विधानसभा की 147 सीटों में से बीजद को 117 सीटें मिली थीं, जो की वर्ष 2009 से 14 सीट ज्यादा थी। लोकसभा सीटों की बात करें तो 2014 में बीजद ने 21 में से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी, तो वहीं बीजेपी को केवल 1 ही सीट मिली। इस प्रकार अगर देखा जाये तो चुनाव होने के साथ साथ बीजद और नवीन पटनायक मजबूत होते चले गए।

सन 2009 के बाद बीजद के वोट प्रतिशत में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। साल 2009 से बीजद का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। साल 2004 में बीजद को 27.5 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि बीजेपी को 17.11 प्रतिशत वोट मिले। अगर सिर्फ चुनाव लड़ने वाले क्षेत्र की बात करे तो बीजद को 47.44 फीसदी वोट मिले थे जबकि बीजेपी को 40.43 प्रतिशत वोट मिले थे। सन 2009 में बीजद और बीजेपी अलग होकर चुनाव लड़े थे जिससे यह आंकड़े बदल गए। 2009 में बीजद का वोट प्रतिशत 27.5 से बढ़कर 38.86 हो गया। साल 2014 में बीजद का वोट प्रतिशत 38.86 से बढ़कर 43.35 हो गया, और बीजेपी को सिर्फ 18 प्रतिशत के करीब वोट मिले थे।

इस प्रकार अगर देखा जाये तो भारतीय जनता पार्टी देश के सभी राज्यों के लोगो को पूरी तरह से गुमराह करने में नाकामयाब रही। और इसके साथ साथ बीजद के वोटो में बढ़ोतरी, यह दिखाता है की ओडिसा की जनता ने बीजेपी की जुमले बाजी को पहचान लिया। इसके साथ साथ यहां की जनता ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को ज्यादा तवज्जों न देते हुए, राज्य सरकार के कामो और बाकी मुद्दों पर वोट दिया।

बीजेपी का यहाँ से हारने का मतलब बनता है की, देश में अभी भी कुछ ऐसे राज्य हैं, जहाँ लोग बीजेपी के जुमलेबाजी से परेशान हो चुके है। और साथ ही इन लोगो ने बीजेपी की सोच को भी अच्छी तरह से भाँप लिया है।

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