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मायावती के सपने और दलित वोट के चलते सपा-बसपा ने कांग्रेस से बनाई दूरी

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(Image Credits: India Today)

12 जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती और अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया कि आने वाले लोकसभा चुनाव और यूपी का अगला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ मिलकर लड़ेंगी। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बसपा सुप्रीमो ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा जो कि कई लोगों को लिए हैरान कर देने वाला था। हालांकि इस बीच अखिलेश काफी संभलकर बोल रहे थे।

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इस प्रेस में बातचीत के बाद सवाल उठने लग गए कि बीजेपी को हटाने के मकसद से तैयार इस गठबंधन के निशाने पर कांग्रेस कैसे आ गई? इसके पीछे मायावती का एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा है जिसमें संभवतः कांग्रेस फिट नहीं होती है। बसपा सुप्रीमो ने अपने जन्मदिन पर आयोजित प्रेस के बात में भी कांग्रेस पर जमकर हमला बोला।

बसपा के कांग्रेस विरोध को डीकोड करना उतना मुश्किल नहीं है। वर्तमान में बीजेपी- विरोधी राजनीति के तहत दोनों पार्टियां भले ही एक तरफ नजर आती हों लेकिन कई मौकों पर कांग्रेस और बसपा के मतभेद दिखाई दे चुके हैं।

80 के दशक में जब बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी बनकर नहीं उभरी थी तब यूपी में बसपा ने कांग्रेस के पारंपरिक दलित वोट बैंक में रोक लगाई थी। अगले 10 सालों में यूपी के दलितों का पूरा वोट कांग्रेस से बसपा की तरफ आ गया। इसका असर पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी नजर आया।

बसपा वर्तमान में राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है जो की यूपी में सम्मानजनक आधार है लेकिन अन्य राज्यों में इसने जो जगह बनाई थी वह धीरे-धीरे खत्म हो चुकी है और मायावती अभी भी इस हार से बाहर निकलने की कोशिश में लगी है।


वैसे तो पुरे देश के दलित वोट पर बसपा और कांग्रेस दोनों की नजर  है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच लंबे वक्त तक चली चर्चा के बाद भी बात नहीं बन पाई थी। कांग्रेस ने सीटों को लेकर बीएसपी की मांग ठुकरा दी थी।

पिछले साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस और बसपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन किया था जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा था। आखिर में बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस के साथ गठबंधन की सरकार चलाने का फैसला किया। छत्तीसगढ़ में भी माना जा रहा था कि बसपा और अजीत जोगी की पार्टी के गठबंधन का कांग्रेस को नुकसान होगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

इस वोट बैंक की लड़ाई में दो पार्टियों का सिर्फ एंटी-आरएसएस और एंटी बीजेपी होना उन्हें एक मंच पर लाने के लिए काफी नहीं है। 2019 की रेस में मायावती ने अपने एंटी-कांग्रेस एजेंडा एक बार फिर बाहर लाने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा था की कि प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती खुद को नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की जगह अपने आप को दिखाना चाहती हैं।  इसके चलते वह कांग्रेस और बीजेपी पर लगातार हमले कर रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इन हमलों का क्या असर पड़ता है यह तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।

रोचक बात यह है कि कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंकने के बाद भी सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस की पारंपरिक रायबरेली और अमेठी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला नहीं लिया है। इन सीटों पर राहुल गांधी और सोनिया गांधी चुनाव लड़ते है। हो सकता है कि एंटी-कांग्रेस एजेंडे के बावजूद मायावती चुनाव के बाद की स्थितियों के लिए भी गुंजाइश बचाए रखना चाहती हैं।

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