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BJP नेता पर चुनाव आयोग ने लगाया 72 घंटो के लिए प्रतिबंध, नेता पर अभद्र भाषा प्रयोग करने का आरोप

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(Image Credits: Awaaz Nation)

लोकसभा चुनाव को लेकर कुछ राजनीतिक पार्टियों के नेता आचार सहिंता के नियमो को ताक पर रखते हुए बयानबाजी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जिसको लेकर कभी चुनाव आयोग द्वारा सिर्फ चेतावनी दी जाती है, तो कभी आयोग उनके खिलाफ कार्रवाई भी कर लेता है। यहाँ कुछ राजनीतिक पार्टियों से हमारा मतलब बीजेपी से हैं। इस लोकसभा चुनाव में यह अक्सर देखा जा रहा कि अधिकतर बीजेपी नेताओ द्वारा ही आचार सहिंता का उल्लंघन हो रहा है।

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दरअसल गुजरात इकाई के बीजेपी प्रमुख जीतूभाई वाघानी को चुनावी सभा में अभद्र भाषा का प्रयोग करने के कारन चुनाव आयोग ने उनपर कार्रवाई की है। आयोग ने उनके ऊपर 72 घंटे का प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध दो मई को शाम चार बजे से लागू हो जाएगा। 23 अप्रैल को गुजरात में तीसरे चरण के मतदान शुरू हुए और राज्य में अभी एक ही चरण में मतदान हुए है।

आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 7 अप्रैल को सूरत के अमरोली में पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को संबोधित करते हुए बीजेपी नेता ने आचार संहिता के उल्लंघन किया। इसके साथ साथ उन्होंने अशोभनीय भाषा का भी इस्तेमाल किया। जिसके कारण बीजेपी नेता वघानी 72 घंटे तक देश के किसी भी हिस्से में जनसभा, रोडशो आदि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे।

इसी प्रकार चुनाव आयोग ने सोमवार को केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा नेता गिरिराज को भी सांप्रदायिक टिप्पणियां करने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग ने कहा कि प्रथमदृष्टया गिरिराज ने आदर्श आचार संहिता के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन किया है। आचार संहिता और उच्चतम न्यायालय के निर्देश कहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान की जाने वाली बयानबाजी में धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। गिरिराज को कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए 24 घंटे का वक्त दिया गया है।

बता दें की बिहार के बेगुसराय जिले में प्रशासन ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 25 अप्रैल को गिरिराज के खिलाफ आदर्श आचार संहिता और जनप्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन का मामला दर्ज किया था। बीजेपी नेता गिरिराज पर 24 अप्रैल को एक जनसभा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में मुस्लिमों के खिलाफ टिप्पणी करने का आरोप है। रैली को संबोधित करते हुए गिरिराज सिंह ने कहा था,‘…जो वंदे मातरम नहीं गा सकता, जो मातृभूमि का सम्मान नहीं कर सकता, उसे देश माफ नहीं करेगा. मेरे पूर्वज सिमरिया घाट में गंगा नदी के किनारे मरे, और उन्हें कब्र की जरूरत नहीं पड़ी. लेकिन तुम्हें तो तीन हाथ जगह चाहिए.’


गिरिराज सिंह द्वारा ऐसे ब्यान देना कोई नई बात नहीं है, इससे पूर्व 2014 लोकसभा के चुनाव में भी उन्होंने सांप्रदायिक टिप्पणियां की थी। जिसके कारन उन्हें बिहार और झारखंड में चुनाव प्रचार करने से रोक दिया गया था।

बीजेपी नेता द्वारा दूसरे समुदाय के लोगो के बारे इस प्रकार की टिप्पणी करने से उनकी मानसिकता का पता चलता है। वह मानसिकता जिसके सहारे वह समाज में ध्रवीकरण की राजनीति को अंजाम देते हैं। इसके साथ साथ उनका यह बयान, वह मानसिकता दर्शाता है जो वर्षो से उनकी पार्टी का हिस्सा रही है।

वहीँ दूसरी ओर विपक्षी दल आम आदमी पार्टी ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री पर आचार संहिता का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था। आप का कहना है कि प्रधानमंत्री के दौरे के पहले सरकारी अधिकारियों को अपने इलाके के बारे में सूचनाएं भेजने के लिए कहना आचार संहिता का उल्लंघन है।

अपने पत्र में आम आदमी पार्टी ने मीडिया की एक खबर का उल्लेख किया है। जिसके अनुसार नीति आयोग ने केंद्रशासित प्रदेशों और भाजपा शासित कम से कम एक राज्य में नौकरशाहों को भेजे गए ई-मेल में प्रधानमंत्री के दौरे के पहले स्थानीय क्षेत्र के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचनाएं देने को कहा।

आम आदमी पार्टी ने कहा यह आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है, जिसमे बताया गया कि मंत्री चुनावी कार्यों के साथ आधिकारिक दौरे को नहीं मिलाएंगे और चुनावी कार्यों के लिए आधिकारिक तंत्र का इस्तेमाल नहीं करेंगे। आप ने चुनाव आयोग से इस सम्बन्ध में मामले की जांच करने और आवश्यक कदम उठाने को कहा है।

मौजूदा सरकार में उनके नेताओं द्वारा किसी विशेष समुदाय के लिए इस प्रकार की टिप्पणी करना बिलकुल भी उचित नहीं है। इस प्रकार की टिप्पणी से उनकी ही पार्टी की छवि का पता चलता है। बीजेपी नेताओ को यह मालूम होना चाहिए की देश के संविधान के अनुसार सबको बराबरी का अधिकार प्राप्त है।

बीजेपी नेताओं द्वारा बार बार आचार सहिंता का उल्लघन करने से यह लगता है की उन्हें कुछ भी करने की छूठ दे दी गई हो। उन्हें किसी भी नियम कानूनों की परवाह नहीं है। इस बार चुनाव आयोग भी ऐसे लोगो के खिलाफ बड़े निर्णय लेने में असमर्थ सा दिखाई दे रहा है। इसके साथ साथ इस बार चुनाव आयोग द्वारा लिए गए फैसलों में काफी नरमी भी देखी जा सकती है। आयोग कार्रवाई तो करता है लेकिन मौजूदा सरकार में आयोग के निर्णय लेने की क्षमता में कमी आती दिख रही है।

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