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मोदी सरकार ने चुनाव से पहले किया किसानो और मजदूरों को लुभाने की कोशिश

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(News Credits: Scroll.in)

मोदी सरकार चुनाव से पहले किसानो और सवर्णो को लुभाने के लिए कई नई योजना लेकर आई। परन्तु इन योजना को पूरा होने में कितना समय लगेगा यह कोई नहीं जनता। इसी प्रकार BJP गठबंधित NDA सरकार ने भी चुनाव से पहले मजदूरों के लिए के नई योजना लाने का एलान किया है। NDA ने आखिरी बजट में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक महात्वाकांक्षी पेंशन योजना घोषित की है।

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इस योजना के देश की सबसे बड़ी योजना माना जा रहा है जिसमे 10 करोड़ लोगो को लाभ होगा। परन्तु इस योजना के साथ मोदी सरकार के अन्य योजनाओ पर भी नजर डालना जरूरी है। इनमें कुछ योजनाए काफी बड़ी है जैसे श्रमेव जयते और अटल पेंशन योजना। श्रमेव जयते योजना में प्रत्येक असंगठित श्रमिक को एक सामाजिक सुरक्षा कार्ड दिया जाना था।

मिंट अखबार की फरवरी 2015 की रिपोर्ट को देखे तो मजदूरों को इस असामान्य पहचान पत्र के जरिये सामाजिक सुरक्षा दी जाएगी जिसमें पेंशन भी शामिल होगी। भाजपा के मंत्रियों ने मेले लगाकर ऐसे हजारों लाखों फार्म जमा किए जो अब धूल खा रहे हैं।

देखा जाए तो इस नयी योजना का हश्र भी पुराने योजनाओ जैसा हो सकता है जो आज तक कभी पुरे नहीं हुए।

9 मई 2015 को अटल पेंशन योजना शुरू की गई थी। योजना का लक्ष्य था कि दिसंबर 2015 तक 2.2 करोड़ लोगों तक पहुंचाना। निर्धारित तिथि तक इस लक्ष्य का 6.5% ही हासिल हो पाया। योजना के तीन साल बाद इसमें करीब 1.1 करोड़ लोग ही शामिल हुए।


आज के समय में भी पहले जैसी फ़ैल योजना के चलते एक और नई योजना का एलान किया गया है। नई योजना की दो मुख्य बातो को लेकर आलोचना की जा सकती है. पहला तो यह कि मजदूरों द्वारा दिया जाने वाला योगदान उनके रोजगार से नहीं जुड़ा है और पूरी तरह वैकल्पिक हैं।

दूसरा कारण है कि 60 साल की उम्र तक जब पेंशन का लाभ मिलना शुरू होगा, मजदूरों की एक बड़ी संख्या ये लाभ उठाने के लिए जिंदा नहीं होगी।

राज्य का इस मामले में रिकॉर्ड इतना खराब है और इतना मजदूर विरोधी है कि मजदूर ऐसी योजना में जिसमें 20-30 साल बाद लाभ मिलना शुरू होगा, अपनी पूरी मेहनत की कमाई कभी नहीं लगाएगा।

यह भी कारण है की लगभग सभी राज्यों ने इस तरह की योगदान करने वाली पेंशन योजनाएं शुरू की। परन्तु आज इन में से ज्यादातर योजनाएं बंद पड़ी है और मजदूरों का पैसा इनमें फंसा पड़ा है। ज्यादातर मजदूर जो 20 से 30 साल तक किस्तें भरेगें 60 साल की उम्र तक योजना का लाभ उठाने के लिए जिंदा नहीं रहेंगे। ये दिखाता है कि लुटियन दिल्ली असली भारत की सच्चाई से कितनी दूर है।

मेहनत करने वाले मजदुर जो निर्माण, ईंट भट्टों, खदानों में काम करते है उनकी औसत आयु और कम होती है। ऐसे किसी भी कार्य स्थल को देखने पर मालूम पडे़गा कि वहां 40 साल के ऊपर का कोई मजदूर काम नहीं कर रहा है। इस उम्र के बाद काम मिलना मुश्किल होता है।

देखा जाए तो यह एक चुनावी खेल है जिसमे योजनाओ की आग जलाई जाती है और मज़दूरों और किसानो के भविष्यों, उनके अरमानो को झोंका जाता है। कई ऐसी योजनाए आयी जो अब किसी कोने में धुल खा रही है। पर योजना का लाभ किसी को नहीं मिला।

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