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NDA की सहयोगी पार्टियों ने तीन तलाक का किया विरोध, क्या पास हो पायेगा नया क़ानून

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(image credits: Hindustan Times)

जहाँ केंद्र सरकार मुस्लिम समुदायों में बनाने की कोशिश में है वही उनके खुद की सहयोगी पार्टियां उसके खिलाफ हो रहे है। केंद्र सरकार के लिए तीन तलाक सबसे बड़ा मुद्दा रहा है जिसके चलते मुस्लिम समुदाय के लोगो ने काफी हंगामा किया था। तीन तलाक के जरिये महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने तीन तलाक पर रोक लगाने की मांग की थी। परन्तु लगता है की सहयोगी पार्टी JDU इससे ज्यादा खुश नहीं है इसलिए वह विरोध पर उतर आयी है।

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जी हां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता वाली पार्टी और एनडीए की सहयोगी JDU ने संसद के आगामी बजट सत्र में तीन तलाक पर लाए जाने वाले बिल का विरोध करने का फैसला किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और नीतीश सरकार में हाल ही मंत्री बनाए गए श्याम रजक ने समाचार एजेंसी INS से कहा कि उनकी पार्टी तीन तलाक के खिलाफ कानून का विरोध करती रही है और आगे भी उनकी पार्टी इसका विरोध करती रहेगी। रजक ने कहा कि तीन तलाक का मुद्दा एक सामाजिक मुद्दा है और इसे उस समाज के लोगो द्वारा ही सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेडीयू ने पहले भी तीन तलाक के खिलाफ लाए गए बिल का राज्यसभा में विरोध किया था।

कुछ दिनों पहले भी नीतीश कुमार ने सबके सामने तीन तलाक बिल का विरोध किया था। इसके अलावा नीतीश ने यह भी यह साफ किया था कि उनकी पार्टी अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता लागू करने और अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए खुले तौर पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत या कोर्ट के फैसले के जरिए समाधान चाहती है। नीतीश जानते हैं कि राज्य सभा में सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है जिससे कि वह इस विधेयक को सदन से पास करा सके। वहीं जेडीयू के कुल छह राज्य सभा सांसद हैं। दरअसल, नीतीश ऐसा करके न केवल मुस्लिमों के हितैषी बने रहना चाहते हैं बल्कि वो स्पष्ट संदेश भी जेना चाहते हैं कि बीजेपी की प्रचंड जीत के बावजूद उनका नजरिया नहीं बदला है।

केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘तीन तलाक’ यानि तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा पर पाबंदी लगाने के लिए एक दिन पहले ही बुधवार 12 जून को ही नए विधेयक को मंजूरी दी। यह विधेयक सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में पेश किया जाएगा और यह पूर्वधिकारी भाजपा नीत राजग सरकार के जरिये फरवरी में जारी एक अध्यादेश का स्थान लेगा। पिछले महीने 16वीं लोकसभा के भंग होने के बाद पिछला विधेयक बेकार हो गया था क्योंकि यह राज्यसभा में अधूरा था। दरअसल, लोकसभा में किसी विधेयक के पारित हो जाने और राज्यसभा में उसके अधूरा रहने की स्थिति में लोकसभा के भंग होने पर वह विधेयक बेकार हो जाता है।

गौरतलब है कि मुस्लिम महिला विधेयक को विपक्षी दलों के विरोध का सामना करना पड़ा था। वह विधेयक तीन तलाक की प्रथा को दंडनीय अपराध बनाता था। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बिल पर कहा कि प्रस्तावित विधेयक लैंगिक समानता पर आधारित है और यह सरकार के दर्शन- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास- का हिस्सा है। नया विधेयक अभी लागू अध्यादेश की प्रति होगा। मंत्री ने आशा जताई कि राज्यसभा, जहां सरकार के पास जरूरी संख्या बल नहीं है उसके जरिये इसे आम राय से पारित कर दिया जाएगा।


नितीश के इस फैसले और विरोध से मुस्लिम लोग खुश तो होंगे परन्तु मुस्लिम महिलाओ पर उसका उल्टा असर पड़ेगा। जहाँ मोदी सरकार महिलाओं के लिए तीन तलाक के मुद्दे को ख़त्म करने की कोशिश में है वही नितीश इसे मुस्लिम समुदायों के निर्णय पर ही छोड़ रहे है। ऐसे में नोटिश का मानना है की जो उन्होंने मुस्लिमो के बिच अपनी जगह बनायी है वह खोना नहीं चाहते।

नीतीश के इस रुख पर केंद्र NDA सरकार क्या कदम उठाती है यह तो लोकसभा में ही पता चलेगा। मुस्लिम समुदाय के में महिलाओ के लिए तीन तलाक का मुद्दा काफी अहम् रहा है और नितीश के इस रुख से यह कहा जा सकता है की मुस्लिम महिलायें ज्यादा खुश नहीं होंगी।

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