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पीएम मोदी ने जाति आधार पर काटे सांसदों के टिकट

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(Image Credits: Moneycontrol)

लगभग सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों के नाम एलान कर दिए है। परन्तु कई ऐसे उम्मीदवार है जिनका टिकट काट दिया गया। टिकट के कारण कई उम्मीदवार अपनी ही पार्टियों पर सवाल उठा रहे है और गुस्सा भी उतार रहे है। हम बात कर रहे है बीजेपी सरकार की जो अपने उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर का रास्ता दिखा रही है। बीजेपी अभी तक 437 उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। उसके अभी लोकसभा में 270 सांसद हैं। इनमें से 102 सांसदों को दोबारा टिकट नहीं दिया गया है।

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बीजेपी ने इस बार बड़ी संख्या में अपने सांसदों के टिकट काटे हैं। माना जा रहा है की सांसदों के खिलाफ उनके चुनाव क्षेत्रों में गुस्से को कम करने के लिए किया गया है। करीब 38 प्रतिशत सांसदों के टिकट काट दिए गए हैं। बीजेपी ने बड़ी संख्या में टिकट काटने का फार्मूला नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए वहां के विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल किया था। पार्टी को इसका फायदा भी मिला था। यही वजह है कि इस फार्मूले को अब लोक सभा में भी लागू किया गया है। बीजेपी ने छत्तीसगढ़ में सभी दस मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भी बड़ी संख्या में सांसदों के टिकट काटे गए हैं।

देखा जाए तो मोदी के गुजरात फार्मूले को इस्तेमाल करके बीजेपी चुनाव में पकड़ बनाना चाहती है। परन्तु यह मुमकिन नहीं लगता। बीजेपी को अपने ही सांसदों पर भरोसा नहीं रहा। यह बात भी सच है की सांसदों से जनता नाखुश है। काम और किये वादों के पूरा ना होने की वजह से मोदी सरकार इस बार नए लोगो को चुनाव लड़ने का मौका दे रही है। यहाँ तक की बीजेपी अपने सबसे वरिष्ठ नेताओ को भी टिकट नहीं दे रही।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में भी कई सांसदों को दोबारा मौका नहीं मिला है। इनमें लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, सुमित्रा महाजन, बीसी खंडूरी, कलराज मिश्र जैसे वे दिग्गज नेता भी शामिल हैं जिन्हें 75 वर्ष की उम्र पूरी होने के कारण बीजेपी ने दोबारा टिकट नहीं दिया है। ऐसा करने में कांग्रेस भी पीछे नहीं है. कांग्रेस के हालांकि सांसद कम हैं। फिर भी उसने अपने 16 सांसदों को दोबारा टिकट नहीं दिया है. यानी करीब 33 प्रतिशत कांग्रेस सांसदों को दोबारा मौका नहीं मिल सका है।

अशोक यूनिवर्सिटी की मदद से जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि बीजेपी ने 243 नए उम्मीदवारों को मौका दिया है। जबकि कांग्रेस ने 304 नए उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। हालांकि दोनों ही पार्टियों के टिकट काटने के तरीके में एक समानता देखी गई है। दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों ने सत्ता विरोधी लहर को कम करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों पर ज्यादा गाज गिराई है। बीजेपी के पास मौजूदा लोक सभा में आरक्षित वर्ग के 63 सांसद हैं। इनमें से 33 सांसदों को दोबारा मौका नहीं दिया गया है। यानी 52 प्रतिशत से भी अधिक दलित आदिवासी सांसद दोबारा टिकट नहीं पा सके हैं। जबकि सामान्य वर्ग के 33 प्रतिशत से अधिक सांसदों के ही टिकट काटे गए हैं. बीजेपी ने सामान्य वर्ग के 69 जबकि आरक्षित वर्ग के 33 सांसदों के टिकट काटे हैं।


बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने भेदभाव तरीके से सांसदों के टिकट काटे है। ऐसे में कई सांसद पार्टी छोड़ के विरोधी पार्टी में जा बसे है। भाजपा अपने इस खेल में सबसे आगे है। भाजपा के ने अधिकतर उन सासंदो का टिकट काटा है जो अनुसूचित जाति से सम्बन्ध रखते है। देखना यह है की टिकट काटने वाला खेल बीजेपी को जीता पायेगा या फिर बीजेपी को हार का मुँह देखना होगा।

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