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उपचुनाव में सपा के सामने आई बढ़ी मुसीबत, इस समुदाय के वोट को बनाये रखना हुआ मुश्किल

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(image credits: Uttarpradesh.org)

लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन समाप्त हो गया, बसपा सुप्रीमो मायवती ने आने वाले उप चुनाव में अकेले ही लड़ने का निर्णय लिया। वहीँ अब गठबंधन के खत्म हो जाने के बाद सपा नेता अखिलेश यादव की मुसीबते बढ़ती नजर आ रही है।

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दरअसल उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) को मुस्लिम वोट बैंक को बनाये रखने की चिंता सता रही है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब इस कवायद में लगे हुए हैं कि किस तरह अपने परंपरागत वोट बैंक को संभाला जाए।

हलांकि सपा अध्यक्ष की पार्टी संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही अल्पसंख्यकों की समस्याओं को लेकर आंदोलन चलाने की तैयारी में है। पार्टी विधानमंडल के मानसून सत्र के बाद चलाए जाने वाले इस अभियान में अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और किसानों पर ही केंद्रित रहने की रणनीति बन रही है।

सूत्र से मिली जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जिन 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से केवल एक रामपुर ही समाजवादी पार्टी के कब्जे में है। ऐसे में रामपुर पर कब्जा बनाये रखने के साथ साथ समाजवादी अन्य सीटों पर भी बेहतर प्रदर्शन चाहती है। जिसके लिए अखिलेश यादव विदेश से लौटने के बाद लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे है। साथ ही उपचुनाव के लिए प्रत्येक सीट के अनुसार समीक्षा भी की जा रही हैं।

राजनैनिक विश्लेषक राजकुमार सिंह ने इस बारे में बताया, जिस तरह बसपा मुखिया मायावती ने लोकसभा में ज्यादा सीटें जीती हैं, मायावती की रणनीति है दलित और मुस्लिम को एकत्रित किया जाए। मुस्लिमों को लगता है कि अखिलेश के साथ जुड़ने से सिर्फ वह यादव के साथ जुड़ते थे। और अगर मायावती के साथ जुड़ेंगे तो दलित और मुस्लिम का अच्छा गठजोड़ होगा। इस हाल में अखिलेश का मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित होगा। सपा अध्यक्ष के सामने बसपा से मुस्लिम वोट बचाए रखने की चुनौती है. अखिलेश के पास मुस्लिम की कोई बड़ी आवाज भी नहीं बची है. आजम हैं भी तो वह अपने ढंग से काम करते हैं.


राजकुमार ने आगे बताया कि अगर अखिलेश को उपचुनाव में अच्छी लड़ाई लड़नी है तो मुस्लिम वोट को बचाना होगा. पिछड़ा वोट बैंक उनसे पूरा खिसक गया है. मुस्लिमों का मानना है कि जो भाजपा को हराएगा, उसी ओर वह अपना रुख करेंगे।

देखा जाए तो मायावती की आवाज बहुत मायने रखती है, क्योंकि उन्होंने चुनाव परिणाम के बाद अखिलेश को दलितों और मुस्लिमों को साथ में संभाल कर नहीं रख पाने की बात कही थी। और ऐसे हालात में सपा के साथ जाना बेकार होगा। लिहाजा, अब अखिलेश के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिनसे उन्हें निपटने की जरूरत है।

एक अन्य विश्लेषक रतनमणि लाल ने बताया कि गठबंधन में सपा के जो मुस्लिम में जीते हैं दोनों पार्टियां एक दूसरे का श्रेय लेने में लगे हैं। उन्होंने बताया , मुस्लिमों को लगता है कि सपा को साथ लेकर चलने की हिम्मत मुलायम और आजम की थी। मुलायम निष्क्रिय हो गए हैं. आजम अब दिल्ली की राजनीति कर रहे हैं. इसीलिए अखिलेश यह भांप गए थे. इसीलिए उन्होंने विष्णु मंदिर बनाने की बात या अन्य मंदिरों में जाना शुरू किया था. यह मुस्लिमों को नगवार गुजरी है, इसीलिए वह अपना रुख बसपा की ओर कर सकते हैं.

इस मामले में बसपा के एक मुस्लिम कार्यकर्ता ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि “सपा का यादव वोटबैंक भी अब डगमगाता दिख रहा है. यादव बिरादरी के अन्य दलों में गए कई पुराने नेता भी सपा में वापसी के बजाय बसपा को ही पसंद कर रहे है. ऐसे में मुसलमानों को 2022 तक सपा से जोड़ने रखना आसान नहीं होगा.”

वहीं मुस्लिमों को लेकर सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा, ‘सपा में मुस्लिम पदाधिकारी बहुत पहले से हैं. वे लगातार हमसे जुड़ रहे हैं. कोई कहीं और नहीं जा रहा है. सपा हमेशा से अल्पसंख्यकों की हितैषी रही है.’

आने वाले उप चुनाव में किसकी जीत होगी यह तो लोगो पर निर्भर करता है, लेकिन इतना जरूर है की सपा बसपा गठबंधन के टूटने पर समाजवादी पार्टी पर खासा असर पड़ता दिख रहा है।

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