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वरिष्‍ठ बीजेपी नेता ने ब्राह्मणों से कहा- इस चुनाव में एकजुट नहीं हुए तो सिर्फ नाम के लिए रह जाओगे

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(Image Credits: Khabar India TV)

प्रधानमंत्री मोदी को कभी कभी अपने भाषणों में भीमराव आंबेडकर के विचारधाराओं की सराहना करते हुए सुने जा सकते हैं। और इसके साथ वो बिना किसी जातिय भेदभाव के लोगों का विकास करने की भी बात करते है। एक तरफ मोदी सरकार समाज में हर जाति और हर तबके का विकास करने का दावा तो करती है, परन्तु दूसरी तरफ उनके ही पार्टी के नेता द्वारा समाज में वोट बैंक के नाम पर किसी खास जाति के लोगो को प्रभावित करते हुए देखा जा सकता है।

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हम बात करने जा रहे हैं बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री जय नारायण व्यास की। दरअसल पूर्व मंत्री जय नारायण व्यास ने रविवार को अखिल भारतीय औदिच्य महासभा के दौरान ब्राह्मण समाज के बारे में एक बयान दिया। जिसमे उन्होंने कहा कि “ब्राह्मणों को दरकिनार कर दिया गया है” उन्होंने आने वाले लोकसभा चुनावों में ब्राह्मण समुदाय के लोगों को एकजुट होकर निर्णायक कारक बनने का आग्रह किया।

व्यास ने कहा ” अगर ब्राह्मण इस चुनाव में एकजुट नहीं हुए तो केवल नाम मात्र के रह जाओगे”। व्यास ने बताया, आज हमारी युवा पीढ़ी आरक्षण के खिलाफ संघर्ष कर रही है जहां सरकारी नौकरियां बहुत सीमित हैं। दूसरी ओर, निम्न जाति और संख्या की राजनीति करने वालों ने अलग-अलग योग्यताएं निर्धारित की हैं और चुनावों में जीत के सिद्धांत को जन्म दिया है। उन्होंने आगे कहा, परिणामस्वरूप, एक-एक करके वरिष्ठ और प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं को राजनीति से समाप्त किया जा रहा है। अगर यह जारी रहता है, तो एक ऐसे लोकतंत्र में ब्राह्मण केवल नाम के लिए बने रहेंगे। ”

भाजपा नेता की इस बयान से यह पता चलता है की। किस प्रकार मौजूदा सरकार के लोग वोटबैंक के लिए किसी एक जाति के लोगो को उकसा रहें है। इसके साथ साथ उनके इस बयान से यह भी मालूम पड़ता है की, कैसे उनके समुदाय के लोगो द्वारा आरक्षण के विरोध में आवाजें उठाई जा रही है। इतना ही नहीं वरिष्ठ नेता नारायण व्यास विपक्षी पार्टियों के लोगो पर ब्राह्मण समुदाय के नेताओं का राजनैतिक भविष्य समाप्त करने का झूठा आरोप भी लगा रहे हैं।

भाजपा नेता यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे कहा, हम राजनीति में एकजुट नहीं हैं। पहले से ही हमारी संख्या बहुत कम है और फिर ब्राह्मण अलग-अलग दलों में विभाजित हैं। हमने अपनी एकता की शक्ति को लगभग नष्ट कर दिया है। मेरा मानना ​​है कि हमें जुनून के साथ राजनीति और सार्वजनिक प्रशासन में शामिल होना चाहिए। हमें यह सोचकर निराश नहीं होना चाहिए कि हमारी संख्या बहुत कम है।


उन्होंने कहा लोकतंत्र में संख्या की ताकत को महत्व नहीं दिया जा सकता। और शायद इसलिए पिछले 30 से 40 वर्षों में ब्राह्मणों ने खुद को दूर कर लिया है। उनको सरकार और सत्ता से दूर रखा गया है। जो सरकारी नौकरी और कानूनों को तैयार कर रही है। जिससे समुदाय को निराशा का सामना करना पड़ा। पूर्व मंत्री व्यास ने कहा आज नौकरियां नहीं है और राजनीती करने के लिए हमें संख्याओं की आवश्यकता है। आखिर में उन्होंने कहा, फिलहाल इन सभी हालातों को बदलने और समाजों को प्रभावित करने के लिए आज हमारे पास अपनी आवाज और अपना व्यवहार बाकि है। चलिए भाजपा नेता ने इन सारी बातों के बीच मौजूदा सरकार में नौकरी न होने की बात तो मान ही ली।

भाजपा नेता द्वारा जनता को जाति के नजरिये से देखना उचित नहीं है। उनके ऐसा करने से उनकी अन्य जातियों के प्रति सोच का पता चलता है। प्रधानमंत्री और बीजेपी के लोग सबका साथ सबका विकास की चाहे कितनी ही बाते क्यों न कर ले लेकिन सच्चाई तो जग जगजाहिर है। सरकार जातिगत भेदभाव मिटाने की बाते तो करती है परन्तु उनकी नीतियों और उनके रवैये से ऐसा लगता नहीं है।

बीजेपी नेता ने इतिहास का उदाहरण देते हुए उस दौरान महत्वपूर्ण पदों पर ब्राह्मणों का उल्लेख करते हुए कहा, “एक समय था जब भाजपा जो आज देश पर शासन कर रही है, उसे ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी के रूप में जाना जाता था। कांग्रेस और अन्य दलों में ब्राह्मणों का योगदान भी सराहनीय है। यह हमारी राजनीति का इतिहास रहा है कि ब्राह्मणों के समर्थन से चुनाव जीतने वाली सभी पार्टियों ने बाद में उन्हें दरकिनार कर दिया।”

अब तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने ही मान लिया है की भाजपा हमेशा से ही सवर्णो की पार्टी रही है। वो पार्टी जो सिर्फ कुछ समुदाय के लोगो के हितो के बारे में ही सोचती हो उस पार्टी द्वारा देश में अन्य जाति और समाजों के लोगो के विकास करने की उम्मीद रखना बिलकुल भी उचित नहीं होगा।

लेकिन लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का कार्य सिर्फ एक ही समुदाय का विकास करना नहीं होता है, बल्कि उस सरकार को देश में लोगो का विकास बिना किसी भेदभाव के करना होता है। और जब सरकार ऐसा करने में असफल रहती है तो बाकि लोगो द्वारा सरकार के प्रति उनका भरोसा टूटने लगता है। और आखिर में फिर जनता को कोई दूसरा विकल्प तलाशना पड़ता है।

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