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सरकार ने किया जवानों के साथ भेदभाव, पुलवामा में मारे गए जवान नहीं कहलायेंगे शहीद

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(Image Credits: Hindustan)

अक्सर खबरे सुनने को मिलती है की छोटे जाति के लोगो को कोई दरजा नहीं दिया जाता यहाँ तक की सम्मान भी नहीं दिया जाता। अक्सर राजनीति इस बात पर होती है की कोई सरकार किसी के लिए काम नहीं करती और सोचती नहीं। परन्तु इस बार सियासी जंग आम आदमी को लेकर नहीं बल्कि देश के जवानो को लेकर है।

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जहाँ एक तरफ देश के जवान शहीद हो गए वही दूसरी तरफ उनकी शहादत को लेकर सियासत काफी गर्म है। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में मारे गए जवानो को शहीद नहीं कहा जा जायेगा। इस घटना को लेकर BJP सरकार पर काफी हमला किया जा रहा है। खुद को जवानो के साथ बताने वाली BJP सरकार ही जवानो को शहीद मानने से इंकार कर रही है।

14 फरवरी जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों ने कायराना हरकत को अंजाम दे कर इंसानियत को शर्मशार कर दिया है। आतंकियों ने सुरक्षा बलों के काफिले को निशाना बनाते हुए बड़ा हमला किया। हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हो गए,जबकि कई जवान घायल हैं। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।

जिस आतंकी ने इस हमले को अंजाम दिया उसका नाम आदिल अहमद डार है। वो पुलवामा जिले के काकपोरा का ही रहने वाला है। खबर है कि आदिल पिछले साल फरवरी में मोस्ट वांटेड आतंकी जाकिर मूसा के गजवत उल हिंद में शामिल हुआ था और कुछ ही महीने पहले ही वह जैश में शामिल हुआ था।

जहाँ इस हमले में शहीद हुए 37 जवानो पर देश आंसू बहा रहा है, वहीं इस पर राजनीति गरमाती जा रही है। विपक्ष जमकर मोदी सरकार पर हमला बोल रहा है और सरकार दावा कर रही है कि इस हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि जवानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी। परन्तु जवानों के शहीद होने पर नेता राजनीति करते रहें, लेकिन सच तो यह है कि किसी ने भी अब तक जवानों के लिए कोई कदम नहीं उठाया।


यहां इस मुद्दे को इस वजह से उठाया जा रहा हैं क्योंकि इस हमले में जो जवान मारे गए हैं उनको हम शहीद तो बोल रहे हैं लेकिन उनको सरकार की तरफ से शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है। दरअसल, CRPF BSF, ITBP या ऐसी ही किसी फोर्स से जिसे पैरामिलिट्री कहते हैं उनके जवान अगर ड्यूटी के दौरान मारे जाते हैं तो उनको शहीद का दर्जा नहीं मिलता है।

वहीं दूसरी और थलसेना, नौसेना या वायुसेना के जवान ड्यूटी के दौरान अगर जान देते हैं तो उन्हें शहीद का दर्जा मिलता है। थलसेना, नौसेना या वायुसेना रक्षा मंत्रालय के तहत काम करता है तो वहीं पैरामिलिट्री फोर्सेज गृह मंत्रालय के तहत काम करते हैं।

इससे यह पता चलता है की आम आदमी से लेकर जवानो तक भेदभाव किया जा रहा है। शहीद जवानो को शाहदत न देकर उस पर राजनीति की जा रही है। बात शहीद के दर्जे में भेदभाव की हो या फिर पेंशन, इलाज, कैंटीन की, जो सुविधाएं सेना के जवानों को मिलती है, वह पैरामिलिट्री को नहीं दिया जाता है।

अगर सीमा पर गोली सेना का जवान खाता है तो बीएसएफ के जवान को भी गोली लगती है। जान उसकी भी जाती है। सेना जहां बाहरी खतरों से देश की रक्षा करती है, जबकि सीआरपीएफ आंतरिक सुरक्षा के लिए तैनात रहती है। पैरामिलिट्री का जवान अगर आतंकी या नक्सली हमले में मारा जाए तो उसकी सिर्फ मौत होती है। उसको शहीद का दर्जा नहीं मिलता है।

शहीद जवान के परिवार वालों को राज्य सरकार में नौकरी में कोटा, शिक्षण संस्थान में उनके बच्चों के लिए सीटें आरक्षित होती हैं। जबकि पैरामिलिट्री के जवानों को ऐसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। इतना ही नहीं पैरामिलिट्री के जवानों को पेंशन की सुविधा भी नहीं मिलती है। जब से सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद हुई है, तब से CRPF -BSF की पेंशन भी बंद कर दी गई। अब सेना इसके दायरे में नहीं है।

ऐसे में साफ है कि चाहे वो विपक्ष हो या सरकार दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं। कांग्रेस की सरकार भी सत्ता में रह चुकी है और अब बीजेपी की सरकार है। दोनों ही सरकारों ने जवानों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें तो जरूर की, लेकिन असल में देश के इन जवानों के लिए दोनों ने कोई बड़ा कदम नहीं उठाया।

खासतौर पर सबकी नजरे मोदी सरकार पर है। खुद को जवानो के साथ बताने वाली मोदी सरकार इस बार शहीद जवानो के लिए कौन सा ठोस कदम उठाएगी। या फिर इनकी शहादत को भुला दिया जायेगा। देखना यह है की सरकारी रेकॉर्ड में इन जवानो को शहीद का दर्जा मिलता है या नहीं और इनकी शहादत का बदला उन आतंकियों से लिया जाता है या नहीं जो इसके जिम्मेदार है।

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